Wednesday, August 3, 2011

     आह्वान

ये लोकपाल बिल के नाम पर
संसद में क्या आ गया है
बिना कारतूस की बंदूक देकर हाथ में
एक सरकारी पिट्ठू को
कुछ चोरो ने खुद ही बनाकर सिपाही
हमारे सामने कुर्सी पर बिठा  दिया
न संतरी को कुछ वो कह पाएगा
न प्रधान मंत्री पर वो ऊँगली उठाएगा
कहता है वो की
'ऐ' ग्रेड तक बनकर सरकारी कर्मचारी
खाओ जितना मर्जी
पर अगर फिर भी तुम्हारा पेट नही भरा
तो फिर वो बर्दाश्त्त नही कर पायेगा
और देकर वो तुम्हे बन्दर घुड़की
फिर फेर कर मुह अपना
अपना फर्ज पूरा कर जाएगा
और इसतरह नकली सतर्कता एजेंसियो की सूची में
एक और नाम जुड़ जाएगा
और इस तरह ये सरकारी अमला
जनता के हाथ में एक और झुनझुना  थमा जाएगा
भ्रष्टाचार, व्यभिचार और अनेतिकता की प्रेतात्माऐ  
समाज में हर तरफ फ़ैल रही है  
नोच रही है ये जनता को और
हर तरफ जनता चीत्कार कर रही है 
अफ़सोस देश का मुखिया 
सत्ता के मोह में होकर आसक्त 
विवेक हीन हो असमर्थ सा देख रहा है 
कि कैसे उसके नाम पर भी  
बदनामी की  कालिख पुत रही है 
क्या देंगे वो जवाब इतहास को 
ये उनसे उनकी अंतर आत्मा पूछ रही है 
मगर देखो दूसरी ओर
एक अंहिंसा वादी जन नायक 
लिए हाथ में सिद्धांतो की लाठी 
करने खुद को देश पर निछावर 
दिल्ली की तरफ आ रहा है 
आओ मिलकर भगाए इन भूतो को 
ये हम सब को समझा रहा है 
न चाहिये इसे कुर्सी, न चाहिये इसे सत्ता 
ये तो बस समाज को इमानदारी से 
जीने की राह दिखा रहा है 
कह रहा है की अब पडोसी के बच्चे को 
मत बताओ शहीद भगत सिंह की कुर्बानी का पाठ 
अब तो हर घर से पैदा करो एक भगत सिंह 
ये बात सारे देशवासियों  को समझा रहा है 
कह रहा है हम सबसे कि 
उठो जागो ! अब वो वक्त आ गया है 
नही सहना और जुल्म और भ्रष्ट्राचार 
अब संघर्ष करने का समय आ गया है 
वरना अगर अब चूक गये हम 
तो पूछेगी आने वाली पीढ़िया
कि जब आज के जुल्मी नादिर शाह 
लूट रहे थे एक बार फिर 
भारत की जनता  का सोमनाथ
तब क्यों सोये रहे तुम 
सब कुछ जानकर भी बनकर अनजान
किसने दिया हक  तुम्हे की 
अपने आज को संघर्ष से बचाने के लिए 
कर दिया तुमने हमारा 
सुनहरा भविष्य इन लुटेरो के सामने कुर्बान 
अगर दे सकते हो इस सबका जवाब इतिहास को 
तो बेशक घर पर सोये रहना 
वरना इस न्याय की लड़ाई में 
सुनकर उस जन नायक का आह्वान 
संवारने को तुम अपना और देश का
आने वाला कल और अपना आज 
उसके साथ जरूर आ जाना  II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'

Monday, May 16, 2011

जख्म

है दर्द मुझे पर ये दर्द जख्म का नही है
है तकलीफ की जिसने दिया ये जख्म 
उसे हम अपना समझ उसकी हम ढाल बने बैठे थे 
नही अफ़सोस की तमन्नाओ का पेड़ सूख गया 
है अफ़सोस की जिसने डाला तेज़ाब मेरी जडो में
उसे अपनी छाँव में हम गोद में लिए बैठे थे 
नही गम की सूख गया या हुआ जख्मी मै 
हूँ परेशान की किसी दिन जब मै चला जाऊंगा 
जिसे तुम समझते हो सिर्फ धमकी 
वो काम तो होगा सिर्फ एक बार  
और जब  वो काम  मै कर जाऊंगा
तब कौन देगा तुम्हे छाँव और 
कौन बनेगा तुम्हारी ढाल क्योंकि 
फिर वापिस मै नही आऊंगा 
है प्रार्थना ये की प्रभु कि
तुम बनकर ढाल और बनकर वृक्ष ,
इस नादान मेरे अपने पर अपनी कृपा बनाये रखना 
और कभी न महसूस हो उसे कमी मेरी 
मेरे बाद भी मेरी याद उसे भुलाए रखना   II


लेखक  प्रवीन चन्द्र  झांझी 'हारा'  
  
हो सकता है

कभी इसने बेचा कभी उसने बेचा
कभी तुने बेचा कभी उसने बेचा
है अफ़सोस की मुझे जिसने भी बेचा
उसने अपना बनकर बेचा
कभी ये टुकड़ा कभी वो टुकड़ा
कभी ये अंग तो कभी वो अंग
मुझे टुकड़े टुकड़े करके बेच दिया
ताकि फिर से में एक सशक्त पूरा शरीर बन न सकू
और फिर सम्मान तो छोड़ो
कभी आत्म सम्मान से भी खड़ा हो न सकू
है ये विडम्बना की अब एक
काली घनघोर चादर में मुझे ये लपेटना चाहते है
ताकि मै उन क्रेता और विक्रेताओ के चेहरे जान न सकू 
और उन चेहरो की असलियत पहचान न लू 
चाहते है ये की मै न देख सकू, न लिख सकू 
बस एक खामोश जिन्दा लाश की तरह 
उनका एहसान मान उनकी ऊँगली पकडकर चलता रहूँ 
पर क्या होगा ये तो भविष्य की बात है
और क्या हो सकता है ये विधि का विधान है
हो सकता है ये मै बनकर चिंगारी और 
बनकर आग इस विश्व मै ज्ञान और जाग्रति की ज्योत बन कर  
इस विश्व को एक नई दिशा दे जाऊ 
या फिर हो सकता है की बनकर बिजली 
छोडकर इस स्थूल शरीर को 
ऊँचे आकाश मे कंही चमक कर बुझ जाऊ  II


लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'     
कृपा

हे प्रभु  अब  मुझे  लगता है कि
मै अब वाकई आपकी शरण में आ गया हूँ 
और अपने किसी शुभ कर्म कि वजह से आप को भा गया हूँ 
अब जब कोई रिश्ता मुझ को पकडकर अपनी और लेजाने लगता है 
आप तुरंत उसकी असलियत मेरे सामने रख देते हो 
जब भी कोई तृष्णा या वासना मुझे आपकी राह से भटकाने लगती है 
आप मुझे तुरंत बांह पकडकर उस सबसे दूर कर देते हो 
जब भी किसी दो राहे पर कोई सांसारिक आकर्षण 
मुझे फिर से घुमाकर संसार में आकर्षित करता है 
आप तुरंत उस राह का द्वार बंद कर देते हो 
है ये असीम कृपा आपकी मुझ पर 
आप इसे यूँ ही बनाये रखना 
कोई संसारिक आकर्षण न भटका पाए मुझे 
आप सदा मेरे गुरु बनकर मुझे अपनी ऊँगली थमाए रखना   II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
मयखाना या बुतखाना

कौन जीता है  कौन हारा है  
क्या तुम जीत कर भी जीते हो 
और तुम तो पहले से ही हारे हुए थे
अब क्या हारे हो 
जीतने वालो क्या किसी सिद्धांत के बल  पर तुम जीते हो 
या फिर वो हारा है इसलिए तुम जीते हो 
आज है परेशान जनता की वाकई 
क्या कोई नया विकल्प उसके सामने आया है या 
कोई नई बोतल में पुरानी शराब भर कर सामने लाया है 
हारने वालो और जीतने वालो दे दो जनता को 
नया विकल्प सम्मान पुर्वक भ्रष्टाचार मुक्त समाज में जीने का 
इस से पहले की बहुत देर हो जाए 
और नही तो कंही ऐसा न हो की 
तुम्हारा ये राजनीति का मयखाना 
तुम्हारे बुतखाने में तब्दील हो जाए II


लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'    
                 इन्कलाब
हर तरफ ये कोलाहल कैसा है
अरे यंहा क्या बिक रहा है 
अरे ये तो इंसान जैसा है 
यंहा तो रिश्तो का व्यापार हो रहा है 
कोई माँ का, कोई बाप का, कोई बहन का, कोई भाई का 
कोई दोस्त का तो कोई पडोस का व्यापार कर रहा है 
कोई औलाद का तो कोई कोई तो भगवान का भी व्यापार कर रहा है
जिन रिश्तो तो पर कभी करता था गर्व अब
इंसान उन रिश्तो का ईमान का सौदा सरे बाज़ार कर रहा है
हर तरफ फैली ये चकाचौंध क्यों है 
कंही कुछ भी स्पष्ट दिखाई क्यों नही दे रहा है 
सिर्फ दिख रही है तो परछाईया स्वार्थ, झूठ और   बईमानी की
दौलत के लालच ने कर दिया है अँधा इंसान को की  
सिवा स्वार्थ के उसे कुछ भी दिखाई नही दे रहा है 
नही देख पा रह वो इस चमक के पीछे छुपे अन्धकार को 
वो पागलो ki भाँती दिशा हीन सा इधर उधर भाग रहा है 
न कोई सिद्धांत, न दिशा न मार्ग ही पता है 
न कोई उसके पास कोई जीने की  प्रेरणा है
न कोई उसे अकांक्षाओ  की कोई सीमा पता है 
अब मानव जानवरों को जीना सिखाने ki बजाए
खुद जानवरों की तरह जीना सीख गया है
न उसे परिवार चाहिये, न उसे सुरक्षित  समाज चाहिये   
बस उसे तो दौलत के पीछे भागने के लिए 
रेगिस्तान में फैली मृग त्रिश्नाओ का तलाब चाहिये
है अच्छा ये ही की चल दू मै चुपचाप यंहा से 
नही तो मुझे तो जीने के लिए यंहा पर इन्कलाब चाहिये II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
    
  

Monday, May 2, 2011

सावधान

आप हो पूजनीय, आप हो स्वामी राम देव,
आप हो अग्निवेश या फिर आप अन्ना हजारे हो 
आप ही हो जनता की आखरी उम्मीद 
आप ही उनकी आखरी आशा के तारे हो 
मगर श्री जय प्रकाश नारायण जैसी गलती आप दोहरा मत देना 
गलती से भी इन राजनीतिज्ञयो को अपनी ऊँगली थमा न देना
वरना फिर कोई लालू बैठ कुर्सी पर आपके दम पर
इस देश के पशुयो का चारा खा जायेगा 
या फिर कोई जार्ज इस देश के वीर जवानो के 
ताबूतो में से कमिशन खा जायेगा 
कंही फिर कोई अंहकारी राज नेत्री लगाकर आपात काल 
कंही फिर जनता की आवाज़ को दबा न जाए 
और फिर कंही किसी जय प्रकाश को जेल में 
कोई खाने में धीमा जहर खिला न जाए 
असल में जिस प्रणाली से ये सब चुन कर आये  है 
उसकी कमजोरी है ये की ये सब आकंठ तक भ्रष्टाचार में समाये है 
है ये उम्मीद की आप  इस नई पीढ़ी को राह दिखायेगे 
और हर गली, हर गाँव और हर शहर में 
किरन बेदी और केजरीवाल जैसे लोगो को आगे लायेंगे 
जो आकर आगे इन भारत माता के कपूतो से 
माँ भारती को मुक्त करा 
एक नये भारत की नीव रख जायेंगे II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'   

Wednesday, April 13, 2011

एहसास

एहसास 

जब कभी भी मै बहुत तन्हा  होता हूँ
नही होता तब मै पास भी खुद के
होकर व्यस्त मै बहुत, जाने कहाँ होता हूँ
मेरे पास आकर मेरे साथ
मेरे गुजरे हुए पल बैठ जाते है
जाने वो कंहा ले जाते है मुझ को 
और छोडकर मुझे यादो के समुन्द्र में तन्हा 
खुद वो न जाने  कंहा खो जाते है
कभी कुछ अक्स आकर लहरों से
मेरे चेहरे को आंसुओ से भिगो जाते है
कभी कुछ यादो के गर्म हवा के झोंके मेरे शरीर को छूकर
कुछ भूले हुए स्पर्शो  के एहसासों में डुबो जाते  है
और कभी कुछ सर्द हवाए बेवफा यादे बनकर
मेरे बदन को झंझोर जाती है
कैसे की हमसफरो ने बेवफाई
ये बाते फिर मेरे जहन में उभर आती है  
और सोचता हूँ मै की ये यादे कब मेरा पीछा छोड़ेगी
और कब मेरे आज पर से  मेरे कल की
परछाईया अपना मुख मोड़ेगी         
ऐ गुजरे जमाने या तो मेरे गुजरे कल के
सुनहरे पलो को मेरे आज का हिस्सा बना दे 
या फिर मत आ बार बार और रखने  दे
मुझे मेरे आंसूयो को अपनी पलको में छिपा के
ये आंसू ही तो मेरे चेहरे को भिगोकर कर
मुझे खींच कर वापिस आज में ले आते है
और मेरे आज को मेरे बीते हुए  कल में डूबने से बचाते है  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'     



Tuesday, April 5, 2011

छुटकारा

                     छुटकारा
हार हारकर इतना हारा कि अब हारो का हार गले में डाल लिया है
हैरान हो अपने मुकद्दर पर कि जिसने जब चाहा तब मुझको हरा दिया है
वैसे तो लोग आपस में खूब लड़े पर 
आया जब सामने मै तो हराने को मुझे सब इकट्ठे हो गये 
यंहा तक कि दिया था साथ कभी जिनका मैंने उन्हें बचाने के लिए 
वक्त आने पर वो भी आकर सामने मेरे खड़े हो गये 
कभी लोगो ने खुलकर मेरा साथ नही दिया 
नही समझ पाया कि पीछे इसके राज़ है क्या 
जिसको जब लगा मौका मेरे साथ अपने सम्बन्धो को उसने कैश किया 
नही सोचा कभी किसी ने कि हर हार के बाद मुझ पर बीतती है क्या 
हार हारकर हर बार नाम अपना मैंने 'हारा' डाल लिया है 
जीते जी कभी जीत न सकूगा मैंने यह कडवा सच जान लिया है 
पर इस जीवन से मै जिस दिन हार जाऊगा मत डालना हार मुझ पर 
क्योंकि हारकर मै अपना जीवन इस हार से 
पाकर छुटकारा अंतिम बाज़ी जीत जाऊगा  II

लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'   

साथ कब तक

          साथ कब तक
जख्म तो सबने दिए पर अफ़सोस तो ये है की
देकर जख्म तुम भी उन सब में शामिल हो गये
मजा तो था की तब जब न देकर जख्म 
तुम औरो के दिए जख्मो को सहलाते तो
शायद तुम हमे उन सबसे अलग नजर आते

इन टीसों की तो हमे आदत पड़ चुकी है
हैरान तो मै तब होता हूँ जब
कि कोई इन पर मलहम क्यों  लगा रहा है
कंही ये देने को नए जख्म
कोई नई  जगह तो नही बना रहा है

दोस्ती, वफा, प्यार और रिश्तो जैसे शब्दों का 
जानता हूँ नही है कोई मतलब आज की दुनिया में
पर फिर भी इतनी बार छला जाकर भी 
भूल जाऊ सब कुछ  इतना भी अनजान नही हूँ   
मगर जब बनाये है रिश्ते तुमसे तो निभाऊ न उसे 
ऐसा भी तो मै बईमान नही हूँ  

जिन्दगी की राहे तो समय के साथ खुद ब खुद चलती जाएँगी 
अच्छा होता की हम हाथ पकडकर एक दुसरे का इन राहो पर चल पाते 
न की सिर्फ गिरने पर ही उठने की लिए एक दुसरे की तरफ हाथ बडाते
पकड़ते अगर दिल से एक दुसरे का हाथ
 तो इन राहो पर ठोकर ही क्यों खाते 

मगर ये हो न सका, ये हो न सका क्योंकि
शायद तुम हमे समझ न पाए या हम तुम्हे समझा न पाए 
 मगर एक बात समझ गये हम दोनों की 
चलना होगा हमे साथ साथ इन राहो पर
जब तक की कोई एक सदा के लिए बिछड़ न जाए   II   

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

Saturday, February 12, 2011

भ्रान्ति

भ्रान्ति

जब तक मै तेरे जुल्मो के खौफ  से डरता रहा
तब तक मै रोज जीकर भी हर रोज मरता रहा
अब तू मुझे मौत से क्या डराता है
अरे मौत को तो मै साथ लेकर चलता हूँ
 ओढकर तेरे किये जुल्मो की यादो का कफन
मै तो हर वक्त अपने वजूद  से लड़ता हूँ
जब तक मै डरकर भागता रहा तुझसे
तब तक नही था पता तुझे की होता डरसे कैसे वास्ता है
अब जब खड़ा हो गया हूँ मै तेरे जुल्मो के खिलाफ तो
बता अब पास तेरे भागने का क्या रास्ता है
घटनाये तो पहले भी रोज होती थी मगर
तब शायद मेरे सब्र की इन्तिहाँ नही हुई थी
जुल्म तो पहले भी होते थे मगर तब
शायद जिन्दगी इतनी बदगुमान नही हुई थी
अब तो जीवन मौत से भी बदतर हो चुका है
अब तो तेरा  अहंकार खुदा के खौफ से भी बडकर हो चुका है
तो चलो अब हम मर मरकर जीने की भ्रान्ति मिटाते है
या तो सुधर जाओ या भाग जाओ क्योंकि
नही तो अब हम क्रांति लाते है     II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी    

छुटकारा

छुटकारा

अनगनित जन्मो से जो रिश्तो के जाल को मै
अपने आस पास बुनता आया
 उसे और अब मै ढोना नही चाहता
लिपटा हुआ कर्मो की परनिति इन रिश्तो  के जाल में
अब और मै अपनी अंतिम नींद सोना नही चाहता
हें प्रभु भेजा था आपने हमे की जाओ
अपने कर्मो के इन बंधन को जो
खड़े है बनके रुकावट तुम्हारी मुक्ति की राह में
भोग कर उन्हें निपटा कर आओ  पर
निपटाना तो क्या था
इन रिश्तो की मोह माया में फंसकर
यह तो कर्मो की एक और भारी गठरी बन गयी है
और बनकर दीवार मेरी मुक्ति की राह में
यह तो हिम शिला सी जम गयी है
हें प्रभु अब आप ही मुझे बचाओ और
मोह माया के इस जाल से मुझे छुडाओ
अब आप ही मुझे इन कर्मो की दल दल से बचाओ
बच पाउँगा मै तब ही जब आप मुझे
अपनी गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ  II 


निवेदक प्रवीन चन्द्र झांझी  

Thursday, February 10, 2011

जाने क्यों

           जाने क्यों 
जाने क्यों मर मर कर जीते है लोग
ज जाने क्यों जीने के लिए हर पल मरते है लोग
क्या मरने से बचना ही जीवन का मतलब है
क्या सिर्फ सांस का चलना ही जीवन है
क्यों कुछ पल की हंसी के लिए बरसों तक रोते है लोग
जीवन की छाया है मृत्यु, प्राणों बिन काया है मृत्यु
सहमा  सा  क्यों रहता  है मरने  से  अरे
जीवन की तो  भार्या  है मृत्यु
अगर मरेगा तभी तो जीवन पायेगा और
अगर जीएगा तभी तो मरेगा
यू डर डर कर तो न तूं मरेगा न ढंग से जी पायेगा
मर मर कर  जियेगा तूं और बिना जिए ही मर जायेगा
जिन्दगी तो मौत की दासी है
ये तो है मौत की मर्जी की वो कब आती है
वैसे भी दिन में कितनी बार तू मरता है
जब भी बोलता है झूठ, जब भी करता है फरेब तब ही तू मरता है
जीवन को जीता कम और जीवन में ज्यादा बार मरता है
उठ खड़ा हो जा जब तक जी शान से जी और
जब न जी सके तो हमेशा के लिए मर जा
खुददारी का नाम ही जीना  है वरना
तो हर पल मरते हुए अपमान का घूँट पीना है II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी


 

Sunday, February 6, 2011

ऊंचाई

ऊंचाई

जितनी होती है इमारत ऊँची, उतनी ही नीवे गहरी होती है
जितनी होती है ऊँची हंसी, उतनी ही उसमे उदासी ठहरी होती है
बिना धरती को गहरा खोदे कभी ऊँची इमारत नही बनती
बहाये न मजदूर अगर पसीना तो कभी इमारत को ऊंचाई नही मिलती  
मगर उन गहराइओ में न जाने कितने रिश्तो  के अहसास दफन होते है
हरेक सफल इन्सान की नीवो में  बहुत से असफल लोगो के कफन  पड़े होते है
जब बनाता है इमारत तो इंसान ने अनगनित सपने सजाये होते है
पर जब खुदती है धरती तो उसने न जाने कितने आंसू बहाये  होते है
जब खोदता है इंसान तो सोचता है इंसान कि क्या हुआ
मै इस गड्डे को इंटो और गारे से भर दूंगा
डाल दूंगा सरिया इसमें और इसे और मजबूत कर दूंगा
भूल जाता है इंसान कि माँ वसुंधरा को पक्की ईंट नही
अपनी बिछुड़ी कच्ची मिटटी प्यारी होती है
जितनी होती है इमारत......................................
लगता है देखने वालो को कि
उन ऊंचाईओ पर रहने वाले खुश  है बहुत
क्योंकि वो कितना ऊँचा पहुंच गये है
मगर वो नही जानते कि वो ऊंचाई पर रहने वाले
अपनी पैरो कि जमीन को ही नीचे से छोड़ चुके है
हो जाओ  बड़े कितने ही पर ये मत भूलो कि
अद्रश्य ही सही पर बच्चे और माँ कि नाडू हमेशा बंधी रहती है
कही भी पहुंच जाओ किसी भी ऊंचाई से देखो
पर ये समझ लो कि जमीन ही हरेक की आखरी मंजिल  है
हर इमारत आखिर  जमीन पर ही ठहरी रहती  है
जितनी होती है इमारत ऊँची, उतनी ही नीवे गहरी होती है
जितनी होती है ऊँची हंसी, उतनी ही उसमे उदासी ठहरी होती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
   

Sunday, January 30, 2011

बस और नही

बस और नही

मै और बंटकर बिकना नही चाहता
बहुत कट चुका हूँ मै अब और कटना नही चाहता
जिस को भी अपने जिस अंग से दे दिया सहारा
उसने ही मेरे उस अंग को काट डाला
अगर काटकर अपने लिए रखता सम्भालकर
तो भी मै शायद शुक्र मनाता पर
हुई ये बेशर्मी की हद को मेरे उस अंग को
उसने सरे बाज़ार ही लटका डाला
जिससे जितना था कीमती रिश्ता मेरा उसने
रिश्तो के बाज़ार में उसका उतना ही ज्यादा मोल लगा डाला
और अफ़सोस मेरे पूरे अस्तित्व को बाज़ार में एक  तमाशा बना डाला
अब तो जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, बक्शो मुझे
अब किसी और रिश्ते में मै बंधना नही चाहता
अब बाकी बचे मुझ को चाहते हो बेचना तो एक मुश्त बेचो
क्योंकि विकृत हो गया हूँ  मै तथा और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता
और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता..............................ई

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी       

अर्धनारीश्वर

अर्धनारीश्वर

हें ! माँ जग तो सब आपकी माया है
आप ही है जननी हमारी और
आपने ही अपनी माया से हमे भरमाया है
बालक है हम आपके और आप ही हमे खेल खिलाती है
और खेलाते खेलाते हमे सत्य के दर्शन करवाती है
यह हम समझ नही पाते क्योंकि बालक है हम
नादान है हम, कमअक्ल है हम, मगर फिर भी मासूम है हम
हें ! माँ कृपा हम पर कर डालो और अपनी माया का जाल हमसे हटा लो
आप ही है भगवान शिव की शक्ति और शक्ति बिन शिव भी है अधूरे
फिर क्या औकात है हमारी और बिन आप की कृपा के कैसे हो कार्य हमारे पूरे
इसलिए कृपा करो और ऊँगली हमारी पकड़ लो और ले चलो हमे सत्य की और
क्योंकि ये ही सत्य है और सत्य ही शिव है और शिव ही सुंदर है 
इसलिए अपने और शिव के अर्धनारीश्वर (शिव-शक्ति का सयुंक्त रूप) रूप को  दे डालो मेरी डोर  II

निवेदक : प्रवीन चन्द्र झांझी   

बाय बाय

बाय बाय

बहुत कहा तुमने बहुत सुना मैंने
जैसा कहा तुमने वैसा किया मैंने
हर ऐतराज को तुम्हारे दूर किया मैंने
हर बात पर तुम्हारी विश्वास किया मैंने
यंहा तक की जब भी कोई टेडी नजर उठी तुम पर
खुद को बीच  में  दीवार बना दिया मैंने
चाहे सही कितनी भी रुस्बाई पर
अपने सब रिश्ते नातों को केन्द्रित तुम में कर दिया मैंने
पर बदले में  क्या दिया तुमने ?
तुम पूरी तरह शिद्धत से कभी मुझे चाह न सकी
पास रहकर भी मेरे पास
पर  कभी पास मेरे तुम  आ न सकी
तुमने कभी न चाहा की सम्मान मिले मुझे अगर
किसी और ने भी दिया तो तुम उसे पचा न सकी
अब तो प्यार-नफरत, सम्मान-अपमान, विश्वास-अविश्वास
यह सब हमारेबीच  बेमाने हो चुके है क्योंकि
अब हम रहकर भी संग संग, एक दूजे से बेगाने हो चुके है
जिस जमाने से चाहती  हो डराना उसने जितना करना था मुझे  कर चुका रुस्बा
अब उस जमाने की परवाह छोड़े तो मुझे कई जमाने हो चुके है
अरे अब तो छोड़ दो दिखानी चतुराई अपनी क्योंकि
तुम्हारी असलियत को पहचाने तो हमे जमाने हो चुके है
बाय बाय II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी
  

Saturday, January 29, 2011

नतीजा

नतीजा

मेरी आँख में छुपी नमी को हरेक ने देखा
पर शायद तुम्हारी आँखे मेरी उस नमी को देख नही पाई
मेरी आवाज के दर्द को हरेक ने पहचाना मगर
शायद वो मेरी  दर्द भरी आवाज तुम कभी सुन नही पायी
यह 'शायद' ही शायद एक कड़ी है हमारे रिश्ते की
यह 'शायद' का भ्रम ही देता है तसल्ली मुझे कि
यह सब शायद अनजाने में हो रहा है     
डरता हूँ कि जिस दिन ये शायद
हम दोनों के बीच  से हट जाएगा
उस दिन हमारा यह रिश्ता भी किसी नतीजे पर पहुंच जाएगा
या तो हम बह निकलेगे मिलकर मचलती लहरों की तरह
नही तो रह जायेंगे  शायद देखते दूर से एक दुसरे को
नदी के दो किनारों की तरह .... दो किनारों की तरह          II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    

अदा शुक्रिया की

अदा शुक्रिया की

हम  यह  सोचकर तुम्हारे हर जुल्म सहते रहे कि
कभी तो तुम समझ जायोगे 
पछताओगे कभी तो अपने किये पर 
कंही तो आकर  ठहर  जायोगे 
लगा था तुम्हे कि दबा दोगे तुम हमे
एक पके हुए फल कि तरह
नही सोचा था तुमने कि हवा के गुबारे कि तरह
तुम सिर्फ एक कोने को ही दबा पायोगे 
नही सोचा था तुमने कि फिसल कर हम
गुबारे के किसी दुसरे कोने में जमा हो जायेगे
और फुलाकर उस कोने को हम हैरान से
तुम्हे यू दबाते हुए देखते रह जायेगे 
चलो अच्छा हुआ तुमने अपना ये रूप भी दिखा दिया 
शायद कोई प्रेम बंधन है हमारे बीच में ये भ्रम भी मिटा दिया 
अगर रहता ये भ्रम तो शायद हम तुम्हे आसानी से छोड़ न पाते 
अगर छोड़ भी जाते तो याद करके तुम्हे हम पछताते पर 
अब जब चाहेगे हम चले जायेगे और 
शायद अब तुम हमे चाहकर भी रोक न पायोगे 
गुबारे को दबाना नही बल्कि 
भरकर हवा उसे हवा में उड़ाना सीखो 
अडंगी लगाकर गिराना तो है बहुत आसान 
पकडकर बांह गिरे हुओ को उठाना सीखो 
उड़ता हुआ गुबार कभी सीधा  नही उड़ता 
बल्कि हिल हिल कर मुड़ता  जाता है
शायद वो अपने उड़ाने वाले का 
शुक्रिया अदा करता जाता है, शुक्रिया अदा करता जाता है II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी

     

Monday, January 24, 2011

परछाई

परछाई 

आज फिर कोई धुंधली सी याद आई है
फिर पड़ी मेरे आज पर
किसी बीते हुए कल की परछाई है
फिर याद आ गया वो हसीन समां
जो संग संग हमने बिताया था
कितना कम हसांया उन पलो ने
और बाद में याद ने उनकी
कितना हमे रुलाया था
हम तो भूल चुके है तुम्हे
पर क्यों तुम रह रह कर यादों में आ जाते हो
जब कोई रिश्ता ही नही बन पाया हम में
तो क्यों आकर अपनापन जताते हो
जाओ दूर चले जाओ मेरे बीते हुए कल
पीछे से देकर आवाज मेरे आज को मत पुकारो
चमकने दे मेरे आने वाले कल को
अपनी परछाई से उसे मत बिगाड़ो    II

लेखक: प्रवीन चन्द्र झांझी   

Sunday, January 23, 2011

रंग और रोशीनी

रंग और रोशीनी

दुनिया को रंग बदलते देखा है
कल को आज और
आज को कल में बदलते देखा है
दिन के उजाले में चमकने वालो को
होते ही शाम बदरंग होते देखा है
रंगो की इस रंगीन दुनिया को
होते ही अँधेरा सफेद से स्याह होकर 
रंग उजड़ते  देखा है
जब तक है उजाला चमकते है मिलकर सब
ढलते ही शाम बचाने को आस्तित्व अपना
खाकर भी एक दूजे को
रंगो को आपस में  झगड़ते देखा है
रंग ये नही समझ पाते है कि
है चमक उनकी उजाले तक
रात कि कालिमा में सब छुप जाते है
रंगीनियों के पीछे भागने वाले नही जानते ये
कि रंगो का है जीवन बहुत कम
खो जाने पर रंगो के वो बहुत पछताते है
जाननी है सच्चाई जीवन कि तो
छोडकर रंगो को उजाले कि तरफ जाओ
उजाले में ही छुपे है रंग सारे
खोलोगे अगर मन कि आँखे तो
हो सकता है शायद तुम उन्हें देख पाओ  ई


लेखक: प्रवीन चन्द्र झांझी
   

Sunday, January 9, 2011

राजनीति

राजनीति

बनाया जब समाज इंसान ने
तो समाज को उसने राज्य का नाम दिया
चुना  अपने में सबसे भुदिमान और बलवान को 
और राजा का  उसको काम दिया

किया बुद्दी का उपयोग उसने
कर प्रजा की सेवा,शुल्क उनसे वसूल लिया
इस तरह राजा  और प्रजा का सम्बन्ध स्थापित हुआ
और राज्य कार्य का प्रचलन शुरू हुआ

मगर आज के युग में
राजा न सिर्फ कर वसूलना चाहता है
बल्कि धमकाता है प्रजा को और
और सेवा अपनी कराता है

भूल गया वो स्वराज को
उसकी तो बस एक ही नीति है
जिस भी नीति से मिले राज
वो नीति ही तो राजनिति है 

न देश, न समाज न प्रजा
की चिंता उसे सताती है
कैसे रहेगी सलामत  कुर्सी उसकी
ये चिंता उसको रात दिन खाती है

बचाने को कुर्सी उसने
कभी घटिया तोप को खरीद लिया
बजाये देने को श्रदांजली शहीदो को
ताबूतो में उनके घोटाला किया

कभी करवा कर दंगे
देश को इन्होने बाँट दिया
कभी जाति, कभी धर्म और कभी सीमा का
हौआ इन्होने खड़ा किया

है परेशान जनता
कोई रास्ता उसे नजर नही आता है
कभी रुलाता है प्याज उसे  और
और कभी टमाटर उसे सताता है

अरे सत्ता के भूखो
कभी कुछ तो शर्म करलिया करो
इसी मिटटी से पैदा हुए
इसीमे मिल जाओगे
कभी तो ये भी  सोच लिया करो
कभी तो ये भी सोच लिया करो ........II


लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

Tuesday, January 4, 2011

मतलब

मतलब


मतलब से पैदा हुआ,
करते हुए पूरे मतलब
यू ही तुझे मर जाना है
है मतलब का तेरा शरीर और
मतलब का ही ये जमाना है

जब करता है तूं मतलब अपना पूरा
तब तो तुझको मतलब मतलब नही लगता है
मगर जब करता है कोई और पूरा मतलब अपना
तब न जाने क्यों तुझको वो खलता है
जब होता है पूरा तेरा मतलब तब तो सब चलता है
मगर जब कोई कहता है ये ही तुझसे तो
न जाने तूं क्यों जलता है

है बनाना है अगर जग को साफ़ तो
मतलब का शब्द जीवन से अपने हटाना होगा
दुसरे करे तो मतलब और खुद करो तो बरकत
ये दोगलापन अपने जीवन से मिटाना होगा

जीना है अगर तो निस्वार्थ भाव से जियो
करना है अगर कर्म तो निष्काम भाव से करो
क्योंकि कामना ही स्वार्थ की जननी है
कामनाये भटकाती है मन  को की चाहे हो अच्छी या हो बुरी
पर इंसान को हर हाल में ये कामनाये ही तो पूरी करनी है

जब हरकोई अपने मतलब के पीछे भागने लग जायेगा
तब मानव और जानवर में कोई फर्क ही नही रह जाएगा
और तब शायद  मानव समाज का
मानो कोई मतलब ही नही रह जायेगा
है फर्क ये ही जानवर और इंसान में कि
जानवर सिर्फ अपने लिए और इंसान समाज के लिए जीता है
इंसान करता है नौछावर जान अपनी समाज के लिए और
जानवर अपने स्वार्थ के लिए दुसरे का खून तक पीता है

होगा करना फैसला अब क्योंकि है समय अब कम
बनना है वापिस इंसान से जानवर और 
बनकर जानवर अधोपतन की ओर जाना है
या फिर बनकर निस्वार्थ इंसान
धरती को स्वर्ग बनाना है, धरती को स्वर्ग बनाना है II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
    

Saturday, January 1, 2011

कहानी नई पुरानी

कहानी नई पुरानी

होते ही पैदा शुरू होती है मानव तेरी सवारी है
क्यों रोता है जाते देख किसी को
आज थी उसकी तो आनी कभी तेरी भी बारी है
है सदियों से सुनते आये सब
नही है नया कुछ भी इसमें
है दोहराती वोही पुरानी कहानी है
मेरे बुजर्गो ने थी सुनाई मुझको
है सुनाई मैंने तुमको
कल तुमने भी कहानी ये ही सुनानी है
पर सुनते सुनाते है सब पर नही करता कोई अम्ल
येही इस माया की निशानी है
होते है पैदा लेकर बोझा कर्मो का
दिखती है जंहा झलक एक ख़ुशी की
भाग पड़ते है भूलकर सब
नही समझते ये तब
कि जीवन नही नाम ख़ुशी का
ये तो है आला दुखो का
इन दुखो से ही तुझे ख़ुशी चुरानी है
भोग विलास में नही है ख़ुशी जीवन की
है भोग विलास तो गुलामी इन्द्रियों की
ये गुलामी ही तेरी अज्ञानता की निशानी है
जो चीज करती है खुश आज तुझको
वोही करेगी कल निराश तुझको
जो थी आज नई वो कल हो जानी पुरानी है
उठ खड़ा हो जा और दे तोड़ बंधन माया के
ले आश्रय उस परम पिता परमेश्वर का
अगर सची ख़ुशी तुझको पानी है
वरना सदियों से दोहराता आया
और सदियों तक रहेगा दोहराता
ये वो हो पुरानी कहानी है, ये वोही पुरानी कहानी है II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी