हो सकता है
कभी इसने बेचा कभी उसने बेचा
कभी तुने बेचा कभी उसने बेचा
है अफ़सोस की मुझे जिसने भी बेचा
उसने अपना बनकर बेचा
कभी ये टुकड़ा कभी वो टुकड़ा
कभी ये अंग तो कभी वो अंग
मुझे टुकड़े टुकड़े करके बेच दिया
ताकि फिर से में एक सशक्त पूरा शरीर बन न सकू
और फिर सम्मान तो छोड़ो
कभी आत्म सम्मान से भी खड़ा हो न सकू
है ये विडम्बना की अब एक
काली घनघोर चादर में मुझे ये लपेटना चाहते है
ताकि मै उन क्रेता और विक्रेताओ के चेहरे जान न सकू
और उन चेहरो की असलियत पहचान न लू
चाहते है ये की मै न देख सकू, न लिख सकू
बस एक खामोश जिन्दा लाश की तरह
उनका एहसान मान उनकी ऊँगली पकडकर चलता रहूँ
पर क्या होगा ये तो भविष्य की बात है
और क्या हो सकता है ये विधि का विधान है
हो सकता है ये मै बनकर चिंगारी और
बनकर आग इस विश्व मै ज्ञान और जाग्रति की ज्योत बन कर
इस विश्व को एक नई दिशा दे जाऊ
या फिर हो सकता है की बनकर बिजली
छोडकर इस स्थूल शरीर को
ऊँचे आकाश मे कंही चमक कर बुझ जाऊ II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
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