इन्कलाब
हर तरफ ये कोलाहल कैसा है अरे यंहा क्या बिक रहा है
अरे ये तो इंसान जैसा है
यंहा तो रिश्तो का व्यापार हो रहा है
कोई माँ का, कोई बाप का, कोई बहन का, कोई भाई का
कोई दोस्त का तो कोई पडोस का व्यापार कर रहा है
कोई औलाद का तो कोई कोई तो भगवान का भी व्यापार कर रहा है
जिन रिश्तो तो पर कभी करता था गर्व अब
इंसान उन रिश्तो का ईमान का सौदा सरे बाज़ार कर रहा है
हर तरफ फैली ये चकाचौंध क्यों है
कंही कुछ भी स्पष्ट दिखाई क्यों नही दे रहा है
सिर्फ दिख रही है तो परछाईया स्वार्थ, झूठ और बईमानी की
दौलत के लालच ने कर दिया है अँधा इंसान को की
सिवा स्वार्थ के उसे कुछ भी दिखाई नही दे रहा है
नही देख पा रह वो इस चमक के पीछे छुपे अन्धकार को
वो पागलो ki भाँती दिशा हीन सा इधर उधर भाग रहा है
न कोई सिद्धांत, न दिशा न मार्ग ही पता है
न कोई उसके पास कोई जीने की प्रेरणा है
न कोई उसे अकांक्षाओ की कोई सीमा पता है
अब मानव जानवरों को जीना सिखाने ki बजाए
खुद जानवरों की तरह जीना सीख गया है
न उसे परिवार चाहिये, न उसे सुरक्षित समाज चाहिये
बस उसे तो दौलत के पीछे भागने के लिए
रेगिस्तान में फैली मृग त्रिश्नाओ का तलाब चाहिये
है अच्छा ये ही की चल दू मै चुपचाप यंहा से
नही तो मुझे तो जीने के लिए यंहा पर इन्कलाब चाहिये II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
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