Saturday, January 29, 2011

अदा शुक्रिया की

अदा शुक्रिया की

हम  यह  सोचकर तुम्हारे हर जुल्म सहते रहे कि
कभी तो तुम समझ जायोगे 
पछताओगे कभी तो अपने किये पर 
कंही तो आकर  ठहर  जायोगे 
लगा था तुम्हे कि दबा दोगे तुम हमे
एक पके हुए फल कि तरह
नही सोचा था तुमने कि हवा के गुबारे कि तरह
तुम सिर्फ एक कोने को ही दबा पायोगे 
नही सोचा था तुमने कि फिसल कर हम
गुबारे के किसी दुसरे कोने में जमा हो जायेगे
और फुलाकर उस कोने को हम हैरान से
तुम्हे यू दबाते हुए देखते रह जायेगे 
चलो अच्छा हुआ तुमने अपना ये रूप भी दिखा दिया 
शायद कोई प्रेम बंधन है हमारे बीच में ये भ्रम भी मिटा दिया 
अगर रहता ये भ्रम तो शायद हम तुम्हे आसानी से छोड़ न पाते 
अगर छोड़ भी जाते तो याद करके तुम्हे हम पछताते पर 
अब जब चाहेगे हम चले जायेगे और 
शायद अब तुम हमे चाहकर भी रोक न पायोगे 
गुबारे को दबाना नही बल्कि 
भरकर हवा उसे हवा में उड़ाना सीखो 
अडंगी लगाकर गिराना तो है बहुत आसान 
पकडकर बांह गिरे हुओ को उठाना सीखो 
उड़ता हुआ गुबार कभी सीधा  नही उड़ता 
बल्कि हिल हिल कर मुड़ता  जाता है
शायद वो अपने उड़ाने वाले का 
शुक्रिया अदा करता जाता है, शुक्रिया अदा करता जाता है II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी

     

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