अदा शुक्रिया की
हम यह सोचकर तुम्हारे हर जुल्म सहते रहे कि
कभी तो तुम समझ जायोगे
पछताओगे कभी तो अपने किये पर
कंही तो आकर ठहर जायोगे
लगा था तुम्हे कि दबा दोगे तुम हमे
एक पके हुए फल कि तरह
नही सोचा था तुमने कि हवा के गुबारे कि तरह
तुम सिर्फ एक कोने को ही दबा पायोगे
नही सोचा था तुमने कि फिसल कर हम
गुबारे के किसी दुसरे कोने में जमा हो जायेगे
और फुलाकर उस कोने को हम हैरान से
तुम्हे यू दबाते हुए देखते रह जायेगे
चलो अच्छा हुआ तुमने अपना ये रूप भी दिखा दिया
शायद कोई प्रेम बंधन है हमारे बीच में ये भ्रम भी मिटा दिया
अगर रहता ये भ्रम तो शायद हम तुम्हे आसानी से छोड़ न पाते
अगर छोड़ भी जाते तो याद करके तुम्हे हम पछताते पर
अब जब चाहेगे हम चले जायेगे और
शायद अब तुम हमे चाहकर भी रोक न पायोगे
गुबारे को दबाना नही बल्कि
भरकर हवा उसे हवा में उड़ाना सीखो
अडंगी लगाकर गिराना तो है बहुत आसान
पकडकर बांह गिरे हुओ को उठाना सीखो
उड़ता हुआ गुबार कभी सीधा नही उड़ता
बल्कि हिल हिल कर मुड़ता जाता है
शायद वो अपने उड़ाने वाले का
शुक्रिया अदा करता जाता है, शुक्रिया अदा करता जाता है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
हम यह सोचकर तुम्हारे हर जुल्म सहते रहे कि
कभी तो तुम समझ जायोगे
पछताओगे कभी तो अपने किये पर
कंही तो आकर ठहर जायोगे
लगा था तुम्हे कि दबा दोगे तुम हमे
एक पके हुए फल कि तरह
नही सोचा था तुमने कि हवा के गुबारे कि तरह
तुम सिर्फ एक कोने को ही दबा पायोगे
नही सोचा था तुमने कि फिसल कर हम
गुबारे के किसी दुसरे कोने में जमा हो जायेगे
और फुलाकर उस कोने को हम हैरान से
तुम्हे यू दबाते हुए देखते रह जायेगे
चलो अच्छा हुआ तुमने अपना ये रूप भी दिखा दिया
शायद कोई प्रेम बंधन है हमारे बीच में ये भ्रम भी मिटा दिया
अगर रहता ये भ्रम तो शायद हम तुम्हे आसानी से छोड़ न पाते
अगर छोड़ भी जाते तो याद करके तुम्हे हम पछताते पर
अब जब चाहेगे हम चले जायेगे और
शायद अब तुम हमे चाहकर भी रोक न पायोगे
गुबारे को दबाना नही बल्कि
भरकर हवा उसे हवा में उड़ाना सीखो
अडंगी लगाकर गिराना तो है बहुत आसान
पकडकर बांह गिरे हुओ को उठाना सीखो
उड़ता हुआ गुबार कभी सीधा नही उड़ता
बल्कि हिल हिल कर मुड़ता जाता है
शायद वो अपने उड़ाने वाले का
शुक्रिया अदा करता जाता है, शुक्रिया अदा करता जाता है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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