Wednesday, April 13, 2011

एहसास

एहसास 

जब कभी भी मै बहुत तन्हा  होता हूँ
नही होता तब मै पास भी खुद के
होकर व्यस्त मै बहुत, जाने कहाँ होता हूँ
मेरे पास आकर मेरे साथ
मेरे गुजरे हुए पल बैठ जाते है
जाने वो कंहा ले जाते है मुझ को 
और छोडकर मुझे यादो के समुन्द्र में तन्हा 
खुद वो न जाने  कंहा खो जाते है
कभी कुछ अक्स आकर लहरों से
मेरे चेहरे को आंसुओ से भिगो जाते है
कभी कुछ यादो के गर्म हवा के झोंके मेरे शरीर को छूकर
कुछ भूले हुए स्पर्शो  के एहसासों में डुबो जाते  है
और कभी कुछ सर्द हवाए बेवफा यादे बनकर
मेरे बदन को झंझोर जाती है
कैसे की हमसफरो ने बेवफाई
ये बाते फिर मेरे जहन में उभर आती है  
और सोचता हूँ मै की ये यादे कब मेरा पीछा छोड़ेगी
और कब मेरे आज पर से  मेरे कल की
परछाईया अपना मुख मोड़ेगी         
ऐ गुजरे जमाने या तो मेरे गुजरे कल के
सुनहरे पलो को मेरे आज का हिस्सा बना दे 
या फिर मत आ बार बार और रखने  दे
मुझे मेरे आंसूयो को अपनी पलको में छिपा के
ये आंसू ही तो मेरे चेहरे को भिगोकर कर
मुझे खींच कर वापिस आज में ले आते है
और मेरे आज को मेरे बीते हुए  कल में डूबने से बचाते है  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'     



Tuesday, April 5, 2011

छुटकारा

                     छुटकारा
हार हारकर इतना हारा कि अब हारो का हार गले में डाल लिया है
हैरान हो अपने मुकद्दर पर कि जिसने जब चाहा तब मुझको हरा दिया है
वैसे तो लोग आपस में खूब लड़े पर 
आया जब सामने मै तो हराने को मुझे सब इकट्ठे हो गये 
यंहा तक कि दिया था साथ कभी जिनका मैंने उन्हें बचाने के लिए 
वक्त आने पर वो भी आकर सामने मेरे खड़े हो गये 
कभी लोगो ने खुलकर मेरा साथ नही दिया 
नही समझ पाया कि पीछे इसके राज़ है क्या 
जिसको जब लगा मौका मेरे साथ अपने सम्बन्धो को उसने कैश किया 
नही सोचा कभी किसी ने कि हर हार के बाद मुझ पर बीतती है क्या 
हार हारकर हर बार नाम अपना मैंने 'हारा' डाल लिया है 
जीते जी कभी जीत न सकूगा मैंने यह कडवा सच जान लिया है 
पर इस जीवन से मै जिस दिन हार जाऊगा मत डालना हार मुझ पर 
क्योंकि हारकर मै अपना जीवन इस हार से 
पाकर छुटकारा अंतिम बाज़ी जीत जाऊगा  II

लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'   

साथ कब तक

          साथ कब तक
जख्म तो सबने दिए पर अफ़सोस तो ये है की
देकर जख्म तुम भी उन सब में शामिल हो गये
मजा तो था की तब जब न देकर जख्म 
तुम औरो के दिए जख्मो को सहलाते तो
शायद तुम हमे उन सबसे अलग नजर आते

इन टीसों की तो हमे आदत पड़ चुकी है
हैरान तो मै तब होता हूँ जब
कि कोई इन पर मलहम क्यों  लगा रहा है
कंही ये देने को नए जख्म
कोई नई  जगह तो नही बना रहा है

दोस्ती, वफा, प्यार और रिश्तो जैसे शब्दों का 
जानता हूँ नही है कोई मतलब आज की दुनिया में
पर फिर भी इतनी बार छला जाकर भी 
भूल जाऊ सब कुछ  इतना भी अनजान नही हूँ   
मगर जब बनाये है रिश्ते तुमसे तो निभाऊ न उसे 
ऐसा भी तो मै बईमान नही हूँ  

जिन्दगी की राहे तो समय के साथ खुद ब खुद चलती जाएँगी 
अच्छा होता की हम हाथ पकडकर एक दुसरे का इन राहो पर चल पाते 
न की सिर्फ गिरने पर ही उठने की लिए एक दुसरे की तरफ हाथ बडाते
पकड़ते अगर दिल से एक दुसरे का हाथ
 तो इन राहो पर ठोकर ही क्यों खाते 

मगर ये हो न सका, ये हो न सका क्योंकि
शायद तुम हमे समझ न पाए या हम तुम्हे समझा न पाए 
 मगर एक बात समझ गये हम दोनों की 
चलना होगा हमे साथ साथ इन राहो पर
जब तक की कोई एक सदा के लिए बिछड़ न जाए   II   

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी