Wednesday, August 3, 2011

     आह्वान

ये लोकपाल बिल के नाम पर
संसद में क्या आ गया है
बिना कारतूस की बंदूक देकर हाथ में
एक सरकारी पिट्ठू को
कुछ चोरो ने खुद ही बनाकर सिपाही
हमारे सामने कुर्सी पर बिठा  दिया
न संतरी को कुछ वो कह पाएगा
न प्रधान मंत्री पर वो ऊँगली उठाएगा
कहता है वो की
'ऐ' ग्रेड तक बनकर सरकारी कर्मचारी
खाओ जितना मर्जी
पर अगर फिर भी तुम्हारा पेट नही भरा
तो फिर वो बर्दाश्त्त नही कर पायेगा
और देकर वो तुम्हे बन्दर घुड़की
फिर फेर कर मुह अपना
अपना फर्ज पूरा कर जाएगा
और इसतरह नकली सतर्कता एजेंसियो की सूची में
एक और नाम जुड़ जाएगा
और इस तरह ये सरकारी अमला
जनता के हाथ में एक और झुनझुना  थमा जाएगा
भ्रष्टाचार, व्यभिचार और अनेतिकता की प्रेतात्माऐ  
समाज में हर तरफ फ़ैल रही है  
नोच रही है ये जनता को और
हर तरफ जनता चीत्कार कर रही है 
अफ़सोस देश का मुखिया 
सत्ता के मोह में होकर आसक्त 
विवेक हीन हो असमर्थ सा देख रहा है 
कि कैसे उसके नाम पर भी  
बदनामी की  कालिख पुत रही है 
क्या देंगे वो जवाब इतहास को 
ये उनसे उनकी अंतर आत्मा पूछ रही है 
मगर देखो दूसरी ओर
एक अंहिंसा वादी जन नायक 
लिए हाथ में सिद्धांतो की लाठी 
करने खुद को देश पर निछावर 
दिल्ली की तरफ आ रहा है 
आओ मिलकर भगाए इन भूतो को 
ये हम सब को समझा रहा है 
न चाहिये इसे कुर्सी, न चाहिये इसे सत्ता 
ये तो बस समाज को इमानदारी से 
जीने की राह दिखा रहा है 
कह रहा है की अब पडोसी के बच्चे को 
मत बताओ शहीद भगत सिंह की कुर्बानी का पाठ 
अब तो हर घर से पैदा करो एक भगत सिंह 
ये बात सारे देशवासियों  को समझा रहा है 
कह रहा है हम सबसे कि 
उठो जागो ! अब वो वक्त आ गया है 
नही सहना और जुल्म और भ्रष्ट्राचार 
अब संघर्ष करने का समय आ गया है 
वरना अगर अब चूक गये हम 
तो पूछेगी आने वाली पीढ़िया
कि जब आज के जुल्मी नादिर शाह 
लूट रहे थे एक बार फिर 
भारत की जनता  का सोमनाथ
तब क्यों सोये रहे तुम 
सब कुछ जानकर भी बनकर अनजान
किसने दिया हक  तुम्हे की 
अपने आज को संघर्ष से बचाने के लिए 
कर दिया तुमने हमारा 
सुनहरा भविष्य इन लुटेरो के सामने कुर्बान 
अगर दे सकते हो इस सबका जवाब इतिहास को 
तो बेशक घर पर सोये रहना 
वरना इस न्याय की लड़ाई में 
सुनकर उस जन नायक का आह्वान 
संवारने को तुम अपना और देश का
आने वाला कल और अपना आज 
उसके साथ जरूर आ जाना  II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'

Monday, May 16, 2011

जख्म

है दर्द मुझे पर ये दर्द जख्म का नही है
है तकलीफ की जिसने दिया ये जख्म 
उसे हम अपना समझ उसकी हम ढाल बने बैठे थे 
नही अफ़सोस की तमन्नाओ का पेड़ सूख गया 
है अफ़सोस की जिसने डाला तेज़ाब मेरी जडो में
उसे अपनी छाँव में हम गोद में लिए बैठे थे 
नही गम की सूख गया या हुआ जख्मी मै 
हूँ परेशान की किसी दिन जब मै चला जाऊंगा 
जिसे तुम समझते हो सिर्फ धमकी 
वो काम तो होगा सिर्फ एक बार  
और जब  वो काम  मै कर जाऊंगा
तब कौन देगा तुम्हे छाँव और 
कौन बनेगा तुम्हारी ढाल क्योंकि 
फिर वापिस मै नही आऊंगा 
है प्रार्थना ये की प्रभु कि
तुम बनकर ढाल और बनकर वृक्ष ,
इस नादान मेरे अपने पर अपनी कृपा बनाये रखना 
और कभी न महसूस हो उसे कमी मेरी 
मेरे बाद भी मेरी याद उसे भुलाए रखना   II


लेखक  प्रवीन चन्द्र  झांझी 'हारा'  
  
हो सकता है

कभी इसने बेचा कभी उसने बेचा
कभी तुने बेचा कभी उसने बेचा
है अफ़सोस की मुझे जिसने भी बेचा
उसने अपना बनकर बेचा
कभी ये टुकड़ा कभी वो टुकड़ा
कभी ये अंग तो कभी वो अंग
मुझे टुकड़े टुकड़े करके बेच दिया
ताकि फिर से में एक सशक्त पूरा शरीर बन न सकू
और फिर सम्मान तो छोड़ो
कभी आत्म सम्मान से भी खड़ा हो न सकू
है ये विडम्बना की अब एक
काली घनघोर चादर में मुझे ये लपेटना चाहते है
ताकि मै उन क्रेता और विक्रेताओ के चेहरे जान न सकू 
और उन चेहरो की असलियत पहचान न लू 
चाहते है ये की मै न देख सकू, न लिख सकू 
बस एक खामोश जिन्दा लाश की तरह 
उनका एहसान मान उनकी ऊँगली पकडकर चलता रहूँ 
पर क्या होगा ये तो भविष्य की बात है
और क्या हो सकता है ये विधि का विधान है
हो सकता है ये मै बनकर चिंगारी और 
बनकर आग इस विश्व मै ज्ञान और जाग्रति की ज्योत बन कर  
इस विश्व को एक नई दिशा दे जाऊ 
या फिर हो सकता है की बनकर बिजली 
छोडकर इस स्थूल शरीर को 
ऊँचे आकाश मे कंही चमक कर बुझ जाऊ  II


लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'     
कृपा

हे प्रभु  अब  मुझे  लगता है कि
मै अब वाकई आपकी शरण में आ गया हूँ 
और अपने किसी शुभ कर्म कि वजह से आप को भा गया हूँ 
अब जब कोई रिश्ता मुझ को पकडकर अपनी और लेजाने लगता है 
आप तुरंत उसकी असलियत मेरे सामने रख देते हो 
जब भी कोई तृष्णा या वासना मुझे आपकी राह से भटकाने लगती है 
आप मुझे तुरंत बांह पकडकर उस सबसे दूर कर देते हो 
जब भी किसी दो राहे पर कोई सांसारिक आकर्षण 
मुझे फिर से घुमाकर संसार में आकर्षित करता है 
आप तुरंत उस राह का द्वार बंद कर देते हो 
है ये असीम कृपा आपकी मुझ पर 
आप इसे यूँ ही बनाये रखना 
कोई संसारिक आकर्षण न भटका पाए मुझे 
आप सदा मेरे गुरु बनकर मुझे अपनी ऊँगली थमाए रखना   II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
मयखाना या बुतखाना

कौन जीता है  कौन हारा है  
क्या तुम जीत कर भी जीते हो 
और तुम तो पहले से ही हारे हुए थे
अब क्या हारे हो 
जीतने वालो क्या किसी सिद्धांत के बल  पर तुम जीते हो 
या फिर वो हारा है इसलिए तुम जीते हो 
आज है परेशान जनता की वाकई 
क्या कोई नया विकल्प उसके सामने आया है या 
कोई नई बोतल में पुरानी शराब भर कर सामने लाया है 
हारने वालो और जीतने वालो दे दो जनता को 
नया विकल्प सम्मान पुर्वक भ्रष्टाचार मुक्त समाज में जीने का 
इस से पहले की बहुत देर हो जाए 
और नही तो कंही ऐसा न हो की 
तुम्हारा ये राजनीति का मयखाना 
तुम्हारे बुतखाने में तब्दील हो जाए II


लेखक    प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'    
                 इन्कलाब
हर तरफ ये कोलाहल कैसा है
अरे यंहा क्या बिक रहा है 
अरे ये तो इंसान जैसा है 
यंहा तो रिश्तो का व्यापार हो रहा है 
कोई माँ का, कोई बाप का, कोई बहन का, कोई भाई का 
कोई दोस्त का तो कोई पडोस का व्यापार कर रहा है 
कोई औलाद का तो कोई कोई तो भगवान का भी व्यापार कर रहा है
जिन रिश्तो तो पर कभी करता था गर्व अब
इंसान उन रिश्तो का ईमान का सौदा सरे बाज़ार कर रहा है
हर तरफ फैली ये चकाचौंध क्यों है 
कंही कुछ भी स्पष्ट दिखाई क्यों नही दे रहा है 
सिर्फ दिख रही है तो परछाईया स्वार्थ, झूठ और   बईमानी की
दौलत के लालच ने कर दिया है अँधा इंसान को की  
सिवा स्वार्थ के उसे कुछ भी दिखाई नही दे रहा है 
नही देख पा रह वो इस चमक के पीछे छुपे अन्धकार को 
वो पागलो ki भाँती दिशा हीन सा इधर उधर भाग रहा है 
न कोई सिद्धांत, न दिशा न मार्ग ही पता है 
न कोई उसके पास कोई जीने की  प्रेरणा है
न कोई उसे अकांक्षाओ  की कोई सीमा पता है 
अब मानव जानवरों को जीना सिखाने ki बजाए
खुद जानवरों की तरह जीना सीख गया है
न उसे परिवार चाहिये, न उसे सुरक्षित  समाज चाहिये   
बस उसे तो दौलत के पीछे भागने के लिए 
रेगिस्तान में फैली मृग त्रिश्नाओ का तलाब चाहिये
है अच्छा ये ही की चल दू मै चुपचाप यंहा से 
नही तो मुझे तो जीने के लिए यंहा पर इन्कलाब चाहिये II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
    
  

Monday, May 2, 2011

सावधान

आप हो पूजनीय, आप हो स्वामी राम देव,
आप हो अग्निवेश या फिर आप अन्ना हजारे हो 
आप ही हो जनता की आखरी उम्मीद 
आप ही उनकी आखरी आशा के तारे हो 
मगर श्री जय प्रकाश नारायण जैसी गलती आप दोहरा मत देना 
गलती से भी इन राजनीतिज्ञयो को अपनी ऊँगली थमा न देना
वरना फिर कोई लालू बैठ कुर्सी पर आपके दम पर
इस देश के पशुयो का चारा खा जायेगा 
या फिर कोई जार्ज इस देश के वीर जवानो के 
ताबूतो में से कमिशन खा जायेगा 
कंही फिर कोई अंहकारी राज नेत्री लगाकर आपात काल 
कंही फिर जनता की आवाज़ को दबा न जाए 
और फिर कंही किसी जय प्रकाश को जेल में 
कोई खाने में धीमा जहर खिला न जाए 
असल में जिस प्रणाली से ये सब चुन कर आये  है 
उसकी कमजोरी है ये की ये सब आकंठ तक भ्रष्टाचार में समाये है 
है ये उम्मीद की आप  इस नई पीढ़ी को राह दिखायेगे 
और हर गली, हर गाँव और हर शहर में 
किरन बेदी और केजरीवाल जैसे लोगो को आगे लायेंगे 
जो आकर आगे इन भारत माता के कपूतो से 
माँ भारती को मुक्त करा 
एक नये भारत की नीव रख जायेंगे II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'