आह्वान
ये लोकपाल बिल के नाम पर
संसद में क्या आ गया है
बिना कारतूस की बंदूक देकर हाथ में
एक सरकारी पिट्ठू को
कुछ चोरो ने खुद ही बनाकर सिपाही
हमारे सामने कुर्सी पर बिठा दिया
न संतरी को कुछ वो कह पाएगा
न प्रधान मंत्री पर वो ऊँगली उठाएगा
कहता है वो की
'ऐ' ग्रेड तक बनकर सरकारी कर्मचारी
खाओ जितना मर्जी
पर अगर फिर भी तुम्हारा पेट नही भरा
तो फिर वो बर्दाश्त्त नही कर पायेगा
और देकर वो तुम्हे बन्दर घुड़की
फिर फेर कर मुह अपना
अपना फर्ज पूरा कर जाएगा
और इसतरह नकली सतर्कता एजेंसियो की सूची में
एक और नाम जुड़ जाएगा
और इस तरह ये सरकारी अमला
जनता के हाथ में एक और झुनझुना थमा जाएगा
भ्रष्टाचार, व्यभिचार और अनेतिकता की प्रेतात्माऐ
समाज में हर तरफ फ़ैल रही है
नोच रही है ये जनता को और
हर तरफ जनता चीत्कार कर रही है
अफ़सोस देश का मुखिया
सत्ता के मोह में होकर आसक्त
विवेक हीन हो असमर्थ सा देख रहा है
कि कैसे उसके नाम पर भी
बदनामी की कालिख पुत रही है
क्या देंगे वो जवाब इतहास को
ये उनसे उनकी अंतर आत्मा पूछ रही है
मगर देखो दूसरी ओर
एक अंहिंसा वादी जन नायक
लिए हाथ में सिद्धांतो की लाठी
करने खुद को देश पर निछावर
दिल्ली की तरफ आ रहा है
आओ मिलकर भगाए इन भूतो को
ये हम सब को समझा रहा है
न चाहिये इसे कुर्सी, न चाहिये इसे सत्ता
ये तो बस समाज को इमानदारी से
जीने की राह दिखा रहा है
कह रहा है की अब पडोसी के बच्चे को
मत बताओ शहीद भगत सिंह की कुर्बानी का पाठ
अब तो हर घर से पैदा करो एक भगत सिंह
ये बात सारे देशवासियों को समझा रहा है
कह रहा है हम सबसे कि
उठो जागो ! अब वो वक्त आ गया है
नही सहना और जुल्म और भ्रष्ट्राचार
अब संघर्ष करने का समय आ गया है
वरना अगर अब चूक गये हम
तो पूछेगी आने वाली पीढ़िया
कि जब आज के जुल्मी नादिर शाह
लूट रहे थे एक बार फिर
भारत की जनता का सोमनाथ
तब क्यों सोये रहे तुम
सब कुछ जानकर भी बनकर अनजान
किसने दिया हक तुम्हे की
अपने आज को संघर्ष से बचाने के लिए
कर दिया तुमने हमारा
सुनहरा भविष्य इन लुटेरो के सामने कुर्बान
अगर दे सकते हो इस सबका जवाब इतिहास को
तो बेशक घर पर सोये रहना
वरना इस न्याय की लड़ाई में
सुनकर उस जन नायक का आह्वान
संवारने को तुम अपना और देश का
आने वाला कल और अपना आज
उसके साथ जरूर आ जाना II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'