रंग और रोशीनी
दुनिया को रंग बदलते देखा है
कल को आज और
आज को कल में बदलते देखा है
दिन के उजाले में चमकने वालो को
होते ही शाम बदरंग होते देखा है
रंगो की इस रंगीन दुनिया को
होते ही अँधेरा सफेद से स्याह होकर
रंग उजड़ते देखा है
जब तक है उजाला चमकते है मिलकर सब
ढलते ही शाम बचाने को आस्तित्व अपना
खाकर भी एक दूजे को
रंगो को आपस में झगड़ते देखा है
रंग ये नही समझ पाते है कि
है चमक उनकी उजाले तक
रात कि कालिमा में सब छुप जाते है
रंगीनियों के पीछे भागने वाले नही जानते ये
कि रंगो का है जीवन बहुत कम
खो जाने पर रंगो के वो बहुत पछताते है
जाननी है सच्चाई जीवन कि तो
छोडकर रंगो को उजाले कि तरफ जाओ
उजाले में ही छुपे है रंग सारे
खोलोगे अगर मन कि आँखे तो
हो सकता है शायद तुम उन्हें देख पाओ ई
लेखक: प्रवीन चन्द्र झांझी
दुनिया को रंग बदलते देखा है
कल को आज और
आज को कल में बदलते देखा है
दिन के उजाले में चमकने वालो को
होते ही शाम बदरंग होते देखा है
रंगो की इस रंगीन दुनिया को
होते ही अँधेरा सफेद से स्याह होकर
रंग उजड़ते देखा है
जब तक है उजाला चमकते है मिलकर सब
ढलते ही शाम बचाने को आस्तित्व अपना
खाकर भी एक दूजे को
रंगो को आपस में झगड़ते देखा है
रंग ये नही समझ पाते है कि
है चमक उनकी उजाले तक
रात कि कालिमा में सब छुप जाते है
रंगीनियों के पीछे भागने वाले नही जानते ये
कि रंगो का है जीवन बहुत कम
खो जाने पर रंगो के वो बहुत पछताते है
जाननी है सच्चाई जीवन कि तो
छोडकर रंगो को उजाले कि तरफ जाओ
उजाले में ही छुपे है रंग सारे
खोलोगे अगर मन कि आँखे तो
हो सकता है शायद तुम उन्हें देख पाओ ई
लेखक: प्रवीन चन्द्र झांझी
No comments:
Post a Comment