Sunday, January 30, 2011

बाय बाय

बाय बाय

बहुत कहा तुमने बहुत सुना मैंने
जैसा कहा तुमने वैसा किया मैंने
हर ऐतराज को तुम्हारे दूर किया मैंने
हर बात पर तुम्हारी विश्वास किया मैंने
यंहा तक की जब भी कोई टेडी नजर उठी तुम पर
खुद को बीच  में  दीवार बना दिया मैंने
चाहे सही कितनी भी रुस्बाई पर
अपने सब रिश्ते नातों को केन्द्रित तुम में कर दिया मैंने
पर बदले में  क्या दिया तुमने ?
तुम पूरी तरह शिद्धत से कभी मुझे चाह न सकी
पास रहकर भी मेरे पास
पर  कभी पास मेरे तुम  आ न सकी
तुमने कभी न चाहा की सम्मान मिले मुझे अगर
किसी और ने भी दिया तो तुम उसे पचा न सकी
अब तो प्यार-नफरत, सम्मान-अपमान, विश्वास-अविश्वास
यह सब हमारेबीच  बेमाने हो चुके है क्योंकि
अब हम रहकर भी संग संग, एक दूजे से बेगाने हो चुके है
जिस जमाने से चाहती  हो डराना उसने जितना करना था मुझे  कर चुका रुस्बा
अब उस जमाने की परवाह छोड़े तो मुझे कई जमाने हो चुके है
अरे अब तो छोड़ दो दिखानी चतुराई अपनी क्योंकि
तुम्हारी असलियत को पहचाने तो हमे जमाने हो चुके है
बाय बाय II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी
  

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