राजनीति
बनाया जब समाज इंसान ने
तो समाज को उसने राज्य का नाम दिया
चुना अपने में सबसे भुदिमान और बलवान को
और राजा का उसको काम दिया
किया बुद्दी का उपयोग उसने
कर प्रजा की सेवा,शुल्क उनसे वसूल लिया
इस तरह राजा और प्रजा का सम्बन्ध स्थापित हुआ
और राज्य कार्य का प्रचलन शुरू हुआ
मगर आज के युग में
राजा न सिर्फ कर वसूलना चाहता है
बल्कि धमकाता है प्रजा को और
और सेवा अपनी कराता है
भूल गया वो स्वराज को
उसकी तो बस एक ही नीति है
जिस भी नीति से मिले राज
वो नीति ही तो राजनिति है
न देश, न समाज न प्रजा
की चिंता उसे सताती है
कैसे रहेगी सलामत कुर्सी उसकी
ये चिंता उसको रात दिन खाती है
बचाने को कुर्सी उसने
कभी घटिया तोप को खरीद लिया
बजाये देने को श्रदांजली शहीदो को
ताबूतो में उनके घोटाला किया
कभी करवा कर दंगे
देश को इन्होने बाँट दिया
कभी जाति, कभी धर्म और कभी सीमा का
हौआ इन्होने खड़ा किया
है परेशान जनता
कोई रास्ता उसे नजर नही आता है
कभी रुलाता है प्याज उसे और
और कभी टमाटर उसे सताता है
अरे सत्ता के भूखो
कभी कुछ तो शर्म करलिया करो
इसी मिटटी से पैदा हुए
इसीमे मिल जाओगे
कभी तो ये भी सोच लिया करो
कभी तो ये भी सोच लिया करो ........II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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