छुटकारा
अनगनित जन्मो से जो रिश्तो के जाल को मै
अपने आस पास बुनता आया
उसे और अब मै ढोना नही चाहता
लिपटा हुआ कर्मो की परनिति इन रिश्तो के जाल में
अब और मै अपनी अंतिम नींद सोना नही चाहता
हें प्रभु भेजा था आपने हमे की जाओ
अपने कर्मो के इन बंधन को जो
खड़े है बनके रुकावट तुम्हारी मुक्ति की राह में
भोग कर उन्हें निपटा कर आओ पर
निपटाना तो क्या था
इन रिश्तो की मोह माया में फंसकर
यह तो कर्मो की एक और भारी गठरी बन गयी है
और बनकर दीवार मेरी मुक्ति की राह में
यह तो हिम शिला सी जम गयी है
हें प्रभु अब आप ही मुझे बचाओ और
मोह माया के इस जाल से मुझे छुडाओ
अब आप ही मुझे इन कर्मो की दल दल से बचाओ
बच पाउँगा मै तब ही जब आप मुझे
अपनी गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ II
निवेदक प्रवीन चन्द्र झांझी
अनगनित जन्मो से जो रिश्तो के जाल को मै
अपने आस पास बुनता आया
उसे और अब मै ढोना नही चाहता
लिपटा हुआ कर्मो की परनिति इन रिश्तो के जाल में
अब और मै अपनी अंतिम नींद सोना नही चाहता
हें प्रभु भेजा था आपने हमे की जाओ
अपने कर्मो के इन बंधन को जो
खड़े है बनके रुकावट तुम्हारी मुक्ति की राह में
भोग कर उन्हें निपटा कर आओ पर
निपटाना तो क्या था
इन रिश्तो की मोह माया में फंसकर
यह तो कर्मो की एक और भारी गठरी बन गयी है
और बनकर दीवार मेरी मुक्ति की राह में
यह तो हिम शिला सी जम गयी है
हें प्रभु अब आप ही मुझे बचाओ और
मोह माया के इस जाल से मुझे छुडाओ
अब आप ही मुझे इन कर्मो की दल दल से बचाओ
बच पाउँगा मै तब ही जब आप मुझे
अपनी गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ II
निवेदक प्रवीन चन्द्र झांझी
No comments:
Post a Comment