भ्रान्ति
जब तक मै तेरे जुल्मो के खौफ से डरता रहा
तब तक मै रोज जीकर भी हर रोज मरता रहा
अब तू मुझे मौत से क्या डराता है
अरे मौत को तो मै साथ लेकर चलता हूँ
ओढकर तेरे किये जुल्मो की यादो का कफन
मै तो हर वक्त अपने वजूद से लड़ता हूँ
जब तक मै डरकर भागता रहा तुझसे
तब तक नही था पता तुझे की होता डरसे कैसे वास्ता है
अब जब खड़ा हो गया हूँ मै तेरे जुल्मो के खिलाफ तो
बता अब पास तेरे भागने का क्या रास्ता है
घटनाये तो पहले भी रोज होती थी मगर
तब शायद मेरे सब्र की इन्तिहाँ नही हुई थी
जुल्म तो पहले भी होते थे मगर तब
शायद जिन्दगी इतनी बदगुमान नही हुई थी
अब तो जीवन मौत से भी बदतर हो चुका है
अब तो तेरा अहंकार खुदा के खौफ से भी बडकर हो चुका है
तो चलो अब हम मर मरकर जीने की भ्रान्ति मिटाते है
या तो सुधर जाओ या भाग जाओ क्योंकि
नही तो अब हम क्रांति लाते है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
जब तक मै तेरे जुल्मो के खौफ से डरता रहा
तब तक मै रोज जीकर भी हर रोज मरता रहा
अब तू मुझे मौत से क्या डराता है
अरे मौत को तो मै साथ लेकर चलता हूँ
ओढकर तेरे किये जुल्मो की यादो का कफन
मै तो हर वक्त अपने वजूद से लड़ता हूँ
जब तक मै डरकर भागता रहा तुझसे
तब तक नही था पता तुझे की होता डरसे कैसे वास्ता है
अब जब खड़ा हो गया हूँ मै तेरे जुल्मो के खिलाफ तो
बता अब पास तेरे भागने का क्या रास्ता है
घटनाये तो पहले भी रोज होती थी मगर
तब शायद मेरे सब्र की इन्तिहाँ नही हुई थी
जुल्म तो पहले भी होते थे मगर तब
शायद जिन्दगी इतनी बदगुमान नही हुई थी
अब तो जीवन मौत से भी बदतर हो चुका है
अब तो तेरा अहंकार खुदा के खौफ से भी बडकर हो चुका है
तो चलो अब हम मर मरकर जीने की भ्रान्ति मिटाते है
या तो सुधर जाओ या भाग जाओ क्योंकि
नही तो अब हम क्रांति लाते है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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