बस और नही
मै और बंटकर बिकना नही चाहता
बहुत कट चुका हूँ मै अब और कटना नही चाहता
जिस को भी अपने जिस अंग से दे दिया सहारा
उसने ही मेरे उस अंग को काट डाला
अगर काटकर अपने लिए रखता सम्भालकर
तो भी मै शायद शुक्र मनाता पर
हुई ये बेशर्मी की हद को मेरे उस अंग को
उसने सरे बाज़ार ही लटका डाला
जिससे जितना था कीमती रिश्ता मेरा उसने
रिश्तो के बाज़ार में उसका उतना ही ज्यादा मोल लगा डाला
और अफ़सोस मेरे पूरे अस्तित्व को बाज़ार में एक तमाशा बना डाला
अब तो जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, बक्शो मुझे
अब किसी और रिश्ते में मै बंधना नही चाहता
अब बाकी बचे मुझ को चाहते हो बेचना तो एक मुश्त बेचो
क्योंकि विकृत हो गया हूँ मै तथा और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता
और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता..............................ई
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
मै और बंटकर बिकना नही चाहता
बहुत कट चुका हूँ मै अब और कटना नही चाहता
जिस को भी अपने जिस अंग से दे दिया सहारा
उसने ही मेरे उस अंग को काट डाला
अगर काटकर अपने लिए रखता सम्भालकर
तो भी मै शायद शुक्र मनाता पर
हुई ये बेशर्मी की हद को मेरे उस अंग को
उसने सरे बाज़ार ही लटका डाला
जिससे जितना था कीमती रिश्ता मेरा उसने
रिश्तो के बाज़ार में उसका उतना ही ज्यादा मोल लगा डाला
और अफ़सोस मेरे पूरे अस्तित्व को बाज़ार में एक तमाशा बना डाला
अब तो जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, बक्शो मुझे
अब किसी और रिश्ते में मै बंधना नही चाहता
अब बाकी बचे मुझ को चाहते हो बेचना तो एक मुश्त बेचो
क्योंकि विकृत हो गया हूँ मै तथा और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता
और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता..............................ई
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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