Sunday, November 28, 2010

शून्य क्यों

शून्य क्यों

आज मै उस जगह गया, जहाँ मै पैदा हुआ था
होकर उस जगह पर खड़ा,
मै खुद से खुद के पैदा होने की वजह पूछता रहा
क्यों मनाई थी खुशियाँ, होने पर पैदा मेरे
उस जगह पर खड़ा होकर मै
इस सवाल से घंटो तक झूझता रहा
पाया इतना ही समझ की
थी उम्मीद पूरी मुझसे होने की स्वार्थो और आकान्शाओ की
ये ही सोच सोच कर जमाना ख़ुशी से झूमता रहा
चल पड़ा जब राह पर जिन्दगी की
जहाँ जुड़े कुछ नए सम्बन्ध पर कुछ पुराने टूटे भी
इन बनते बिगड़ते रिश्तो में छुपे स्वार्थो को छुपाने के लिए
कभी मै और कभी दूसरा पक्ष कारणों का अवारण ढूंढता  रहा

और आज जब मै होकर परेशान और
समझकर अपने पैदा होने की जगह को मनहूस
जानने को अपने पैदा होने की वजह जब खोदा उस जगह को
तो अपने पैदाइश के बीज के नीचे
छोटी छोटी जड़ो का जंजाल बिछा पाया
ये बीज जुड़ा था उन जड़ो द्वारा अनगनित बीजो से
उनमे से कुछ बीजो की जड़े तो सूख कर टूटने को थी
और कुछ थी इंतज़ार में जुड़ने को मेरे बीज से
क्योंकि उनके जुड़ने का नही था अभी समय आया

जो जुड़ चुकी थी और सूख रही थी
उन्होंने तो कर लिया अपना अच्छा बुरा हिसाब
पर जो कर रही थी इंतज़ार
उनका तो अभी अच्छा बुरा  हिसाब बाकी था
लगाया जब हिसाब तो लगा की
जीवन है छोटा, हिसाब है लम्बा
और लगता है की वक़्त नाकाफी है

ज्यों ज्यों मै अपने बीज से जुडी जड़ो को खोजता  रहा
और उस बीज के नीचे की जमीन को और खोदता रहा
हर सतह पर ऐसे अनगनित बीजो को
निपटाने को हिसाब इंतज़ार करते पाया और
और जब न लगा पाया हिसाब तो
घबरा कर वापिस लौट आया

और अब करने लगा प्रार्थना अपने प्रभु शिव से
हें प्रभु करना हिसाब किताब मेरे बस की बात नही
करता हूँ प्रणाम और समर्पण समक्ष तुम्हारे,
तथा है विनती तुमसे मेरी यही,
कि मेरे अच्छे बुरे कर्मो को आप भुला दो
और मुझ जैसे तुच्छ प्राणी को चरणों से अपने लगा लो
जला दो मुझ बीज को
और जो हो उत्पन्न उससे चिंगारी
उस चिंगारी को अपने दिव्य प्रकाश में मिला मिला दो   II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी