जख्म
है दर्द मुझे पर ये दर्द जख्म का नही है
है तकलीफ की जिसने दिया ये जख्म
उसे हम अपना समझ उसकी हम ढाल बने बैठे थे
नही अफ़सोस की तमन्नाओ का पेड़ सूख गया
है अफ़सोस की जिसने डाला तेज़ाब मेरी जडो में
उसे अपनी छाँव में हम गोद में लिए बैठे थे
नही गम की सूख गया या हुआ जख्मी मै
हूँ परेशान की किसी दिन जब मै चला जाऊंगा
जिसे तुम समझते हो सिर्फ धमकी
वो काम तो होगा सिर्फ एक बार
और जब वो काम मै कर जाऊंगा
तब कौन देगा तुम्हे छाँव और
कौन बनेगा तुम्हारी ढाल क्योंकि
फिर वापिस मै नही आऊंगा
है प्रार्थना ये की प्रभु कि
तुम बनकर ढाल और बनकर वृक्ष ,
इस नादान मेरे अपने पर अपनी कृपा बनाये रखना
और कभी न महसूस हो उसे कमी मेरी
मेरे बाद भी मेरी याद उसे भुलाए रखना II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'