Saturday, February 12, 2011

भ्रान्ति

भ्रान्ति

जब तक मै तेरे जुल्मो के खौफ  से डरता रहा
तब तक मै रोज जीकर भी हर रोज मरता रहा
अब तू मुझे मौत से क्या डराता है
अरे मौत को तो मै साथ लेकर चलता हूँ
 ओढकर तेरे किये जुल्मो की यादो का कफन
मै तो हर वक्त अपने वजूद  से लड़ता हूँ
जब तक मै डरकर भागता रहा तुझसे
तब तक नही था पता तुझे की होता डरसे कैसे वास्ता है
अब जब खड़ा हो गया हूँ मै तेरे जुल्मो के खिलाफ तो
बता अब पास तेरे भागने का क्या रास्ता है
घटनाये तो पहले भी रोज होती थी मगर
तब शायद मेरे सब्र की इन्तिहाँ नही हुई थी
जुल्म तो पहले भी होते थे मगर तब
शायद जिन्दगी इतनी बदगुमान नही हुई थी
अब तो जीवन मौत से भी बदतर हो चुका है
अब तो तेरा  अहंकार खुदा के खौफ से भी बडकर हो चुका है
तो चलो अब हम मर मरकर जीने की भ्रान्ति मिटाते है
या तो सुधर जाओ या भाग जाओ क्योंकि
नही तो अब हम क्रांति लाते है     II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी    

छुटकारा

छुटकारा

अनगनित जन्मो से जो रिश्तो के जाल को मै
अपने आस पास बुनता आया
 उसे और अब मै ढोना नही चाहता
लिपटा हुआ कर्मो की परनिति इन रिश्तो  के जाल में
अब और मै अपनी अंतिम नींद सोना नही चाहता
हें प्रभु भेजा था आपने हमे की जाओ
अपने कर्मो के इन बंधन को जो
खड़े है बनके रुकावट तुम्हारी मुक्ति की राह में
भोग कर उन्हें निपटा कर आओ  पर
निपटाना तो क्या था
इन रिश्तो की मोह माया में फंसकर
यह तो कर्मो की एक और भारी गठरी बन गयी है
और बनकर दीवार मेरी मुक्ति की राह में
यह तो हिम शिला सी जम गयी है
हें प्रभु अब आप ही मुझे बचाओ और
मोह माया के इस जाल से मुझे छुडाओ
अब आप ही मुझे इन कर्मो की दल दल से बचाओ
बच पाउँगा मै तब ही जब आप मुझे
अपनी गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ, गोदी में उठाओ  II 


निवेदक प्रवीन चन्द्र झांझी  

Thursday, February 10, 2011

जाने क्यों

           जाने क्यों 
जाने क्यों मर मर कर जीते है लोग
ज जाने क्यों जीने के लिए हर पल मरते है लोग
क्या मरने से बचना ही जीवन का मतलब है
क्या सिर्फ सांस का चलना ही जीवन है
क्यों कुछ पल की हंसी के लिए बरसों तक रोते है लोग
जीवन की छाया है मृत्यु, प्राणों बिन काया है मृत्यु
सहमा  सा  क्यों रहता  है मरने  से  अरे
जीवन की तो  भार्या  है मृत्यु
अगर मरेगा तभी तो जीवन पायेगा और
अगर जीएगा तभी तो मरेगा
यू डर डर कर तो न तूं मरेगा न ढंग से जी पायेगा
मर मर कर  जियेगा तूं और बिना जिए ही मर जायेगा
जिन्दगी तो मौत की दासी है
ये तो है मौत की मर्जी की वो कब आती है
वैसे भी दिन में कितनी बार तू मरता है
जब भी बोलता है झूठ, जब भी करता है फरेब तब ही तू मरता है
जीवन को जीता कम और जीवन में ज्यादा बार मरता है
उठ खड़ा हो जा जब तक जी शान से जी और
जब न जी सके तो हमेशा के लिए मर जा
खुददारी का नाम ही जीना  है वरना
तो हर पल मरते हुए अपमान का घूँट पीना है II


लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी


 

Sunday, February 6, 2011

ऊंचाई

ऊंचाई

जितनी होती है इमारत ऊँची, उतनी ही नीवे गहरी होती है
जितनी होती है ऊँची हंसी, उतनी ही उसमे उदासी ठहरी होती है
बिना धरती को गहरा खोदे कभी ऊँची इमारत नही बनती
बहाये न मजदूर अगर पसीना तो कभी इमारत को ऊंचाई नही मिलती  
मगर उन गहराइओ में न जाने कितने रिश्तो  के अहसास दफन होते है
हरेक सफल इन्सान की नीवो में  बहुत से असफल लोगो के कफन  पड़े होते है
जब बनाता है इमारत तो इंसान ने अनगनित सपने सजाये होते है
पर जब खुदती है धरती तो उसने न जाने कितने आंसू बहाये  होते है
जब खोदता है इंसान तो सोचता है इंसान कि क्या हुआ
मै इस गड्डे को इंटो और गारे से भर दूंगा
डाल दूंगा सरिया इसमें और इसे और मजबूत कर दूंगा
भूल जाता है इंसान कि माँ वसुंधरा को पक्की ईंट नही
अपनी बिछुड़ी कच्ची मिटटी प्यारी होती है
जितनी होती है इमारत......................................
लगता है देखने वालो को कि
उन ऊंचाईओ पर रहने वाले खुश  है बहुत
क्योंकि वो कितना ऊँचा पहुंच गये है
मगर वो नही जानते कि वो ऊंचाई पर रहने वाले
अपनी पैरो कि जमीन को ही नीचे से छोड़ चुके है
हो जाओ  बड़े कितने ही पर ये मत भूलो कि
अद्रश्य ही सही पर बच्चे और माँ कि नाडू हमेशा बंधी रहती है
कही भी पहुंच जाओ किसी भी ऊंचाई से देखो
पर ये समझ लो कि जमीन ही हरेक की आखरी मंजिल  है
हर इमारत आखिर  जमीन पर ही ठहरी रहती  है
जितनी होती है इमारत ऊँची, उतनी ही नीवे गहरी होती है
जितनी होती है ऊँची हंसी, उतनी ही उसमे उदासी ठहरी होती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी