Tuesday, April 5, 2011

साथ कब तक

          साथ कब तक
जख्म तो सबने दिए पर अफ़सोस तो ये है की
देकर जख्म तुम भी उन सब में शामिल हो गये
मजा तो था की तब जब न देकर जख्म 
तुम औरो के दिए जख्मो को सहलाते तो
शायद तुम हमे उन सबसे अलग नजर आते

इन टीसों की तो हमे आदत पड़ चुकी है
हैरान तो मै तब होता हूँ जब
कि कोई इन पर मलहम क्यों  लगा रहा है
कंही ये देने को नए जख्म
कोई नई  जगह तो नही बना रहा है

दोस्ती, वफा, प्यार और रिश्तो जैसे शब्दों का 
जानता हूँ नही है कोई मतलब आज की दुनिया में
पर फिर भी इतनी बार छला जाकर भी 
भूल जाऊ सब कुछ  इतना भी अनजान नही हूँ   
मगर जब बनाये है रिश्ते तुमसे तो निभाऊ न उसे 
ऐसा भी तो मै बईमान नही हूँ  

जिन्दगी की राहे तो समय के साथ खुद ब खुद चलती जाएँगी 
अच्छा होता की हम हाथ पकडकर एक दुसरे का इन राहो पर चल पाते 
न की सिर्फ गिरने पर ही उठने की लिए एक दुसरे की तरफ हाथ बडाते
पकड़ते अगर दिल से एक दुसरे का हाथ
 तो इन राहो पर ठोकर ही क्यों खाते 

मगर ये हो न सका, ये हो न सका क्योंकि
शायद तुम हमे समझ न पाए या हम तुम्हे समझा न पाए 
 मगर एक बात समझ गये हम दोनों की 
चलना होगा हमे साथ साथ इन राहो पर
जब तक की कोई एक सदा के लिए बिछड़ न जाए   II   

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

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