Sunday, January 30, 2011

बस और नही

बस और नही

मै और बंटकर बिकना नही चाहता
बहुत कट चुका हूँ मै अब और कटना नही चाहता
जिस को भी अपने जिस अंग से दे दिया सहारा
उसने ही मेरे उस अंग को काट डाला
अगर काटकर अपने लिए रखता सम्भालकर
तो भी मै शायद शुक्र मनाता पर
हुई ये बेशर्मी की हद को मेरे उस अंग को
उसने सरे बाज़ार ही लटका डाला
जिससे जितना था कीमती रिश्ता मेरा उसने
रिश्तो के बाज़ार में उसका उतना ही ज्यादा मोल लगा डाला
और अफ़सोस मेरे पूरे अस्तित्व को बाज़ार में एक  तमाशा बना डाला
अब तो जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, बक्शो मुझे
अब किसी और रिश्ते में मै बंधना नही चाहता
अब बाकी बचे मुझ को चाहते हो बेचना तो एक मुश्त बेचो
क्योंकि विकृत हो गया हूँ  मै तथा और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता
और टुकडो में मै अब बटना नही चाहता..............................ई

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी       

अर्धनारीश्वर

अर्धनारीश्वर

हें ! माँ जग तो सब आपकी माया है
आप ही है जननी हमारी और
आपने ही अपनी माया से हमे भरमाया है
बालक है हम आपके और आप ही हमे खेल खिलाती है
और खेलाते खेलाते हमे सत्य के दर्शन करवाती है
यह हम समझ नही पाते क्योंकि बालक है हम
नादान है हम, कमअक्ल है हम, मगर फिर भी मासूम है हम
हें ! माँ कृपा हम पर कर डालो और अपनी माया का जाल हमसे हटा लो
आप ही है भगवान शिव की शक्ति और शक्ति बिन शिव भी है अधूरे
फिर क्या औकात है हमारी और बिन आप की कृपा के कैसे हो कार्य हमारे पूरे
इसलिए कृपा करो और ऊँगली हमारी पकड़ लो और ले चलो हमे सत्य की और
क्योंकि ये ही सत्य है और सत्य ही शिव है और शिव ही सुंदर है 
इसलिए अपने और शिव के अर्धनारीश्वर (शिव-शक्ति का सयुंक्त रूप) रूप को  दे डालो मेरी डोर  II

निवेदक : प्रवीन चन्द्र झांझी   

बाय बाय

बाय बाय

बहुत कहा तुमने बहुत सुना मैंने
जैसा कहा तुमने वैसा किया मैंने
हर ऐतराज को तुम्हारे दूर किया मैंने
हर बात पर तुम्हारी विश्वास किया मैंने
यंहा तक की जब भी कोई टेडी नजर उठी तुम पर
खुद को बीच  में  दीवार बना दिया मैंने
चाहे सही कितनी भी रुस्बाई पर
अपने सब रिश्ते नातों को केन्द्रित तुम में कर दिया मैंने
पर बदले में  क्या दिया तुमने ?
तुम पूरी तरह शिद्धत से कभी मुझे चाह न सकी
पास रहकर भी मेरे पास
पर  कभी पास मेरे तुम  आ न सकी
तुमने कभी न चाहा की सम्मान मिले मुझे अगर
किसी और ने भी दिया तो तुम उसे पचा न सकी
अब तो प्यार-नफरत, सम्मान-अपमान, विश्वास-अविश्वास
यह सब हमारेबीच  बेमाने हो चुके है क्योंकि
अब हम रहकर भी संग संग, एक दूजे से बेगाने हो चुके है
जिस जमाने से चाहती  हो डराना उसने जितना करना था मुझे  कर चुका रुस्बा
अब उस जमाने की परवाह छोड़े तो मुझे कई जमाने हो चुके है
अरे अब तो छोड़ दो दिखानी चतुराई अपनी क्योंकि
तुम्हारी असलियत को पहचाने तो हमे जमाने हो चुके है
बाय बाय II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी
  

Saturday, January 29, 2011

नतीजा

नतीजा

मेरी आँख में छुपी नमी को हरेक ने देखा
पर शायद तुम्हारी आँखे मेरी उस नमी को देख नही पाई
मेरी आवाज के दर्द को हरेक ने पहचाना मगर
शायद वो मेरी  दर्द भरी आवाज तुम कभी सुन नही पायी
यह 'शायद' ही शायद एक कड़ी है हमारे रिश्ते की
यह 'शायद' का भ्रम ही देता है तसल्ली मुझे कि
यह सब शायद अनजाने में हो रहा है     
डरता हूँ कि जिस दिन ये शायद
हम दोनों के बीच  से हट जाएगा
उस दिन हमारा यह रिश्ता भी किसी नतीजे पर पहुंच जाएगा
या तो हम बह निकलेगे मिलकर मचलती लहरों की तरह
नही तो रह जायेंगे  शायद देखते दूर से एक दुसरे को
नदी के दो किनारों की तरह .... दो किनारों की तरह          II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी    

अदा शुक्रिया की

अदा शुक्रिया की

हम  यह  सोचकर तुम्हारे हर जुल्म सहते रहे कि
कभी तो तुम समझ जायोगे 
पछताओगे कभी तो अपने किये पर 
कंही तो आकर  ठहर  जायोगे 
लगा था तुम्हे कि दबा दोगे तुम हमे
एक पके हुए फल कि तरह
नही सोचा था तुमने कि हवा के गुबारे कि तरह
तुम सिर्फ एक कोने को ही दबा पायोगे 
नही सोचा था तुमने कि फिसल कर हम
गुबारे के किसी दुसरे कोने में जमा हो जायेगे
और फुलाकर उस कोने को हम हैरान से
तुम्हे यू दबाते हुए देखते रह जायेगे 
चलो अच्छा हुआ तुमने अपना ये रूप भी दिखा दिया 
शायद कोई प्रेम बंधन है हमारे बीच में ये भ्रम भी मिटा दिया 
अगर रहता ये भ्रम तो शायद हम तुम्हे आसानी से छोड़ न पाते 
अगर छोड़ भी जाते तो याद करके तुम्हे हम पछताते पर 
अब जब चाहेगे हम चले जायेगे और 
शायद अब तुम हमे चाहकर भी रोक न पायोगे 
गुबारे को दबाना नही बल्कि 
भरकर हवा उसे हवा में उड़ाना सीखो 
अडंगी लगाकर गिराना तो है बहुत आसान 
पकडकर बांह गिरे हुओ को उठाना सीखो 
उड़ता हुआ गुबार कभी सीधा  नही उड़ता 
बल्कि हिल हिल कर मुड़ता  जाता है
शायद वो अपने उड़ाने वाले का 
शुक्रिया अदा करता जाता है, शुक्रिया अदा करता जाता है II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी

     

Monday, January 24, 2011

परछाई

परछाई 

आज फिर कोई धुंधली सी याद आई है
फिर पड़ी मेरे आज पर
किसी बीते हुए कल की परछाई है
फिर याद आ गया वो हसीन समां
जो संग संग हमने बिताया था
कितना कम हसांया उन पलो ने
और बाद में याद ने उनकी
कितना हमे रुलाया था
हम तो भूल चुके है तुम्हे
पर क्यों तुम रह रह कर यादों में आ जाते हो
जब कोई रिश्ता ही नही बन पाया हम में
तो क्यों आकर अपनापन जताते हो
जाओ दूर चले जाओ मेरे बीते हुए कल
पीछे से देकर आवाज मेरे आज को मत पुकारो
चमकने दे मेरे आने वाले कल को
अपनी परछाई से उसे मत बिगाड़ो    II

लेखक: प्रवीन चन्द्र झांझी   

Sunday, January 23, 2011

रंग और रोशीनी

रंग और रोशीनी

दुनिया को रंग बदलते देखा है
कल को आज और
आज को कल में बदलते देखा है
दिन के उजाले में चमकने वालो को
होते ही शाम बदरंग होते देखा है
रंगो की इस रंगीन दुनिया को
होते ही अँधेरा सफेद से स्याह होकर 
रंग उजड़ते  देखा है
जब तक है उजाला चमकते है मिलकर सब
ढलते ही शाम बचाने को आस्तित्व अपना
खाकर भी एक दूजे को
रंगो को आपस में  झगड़ते देखा है
रंग ये नही समझ पाते है कि
है चमक उनकी उजाले तक
रात कि कालिमा में सब छुप जाते है
रंगीनियों के पीछे भागने वाले नही जानते ये
कि रंगो का है जीवन बहुत कम
खो जाने पर रंगो के वो बहुत पछताते है
जाननी है सच्चाई जीवन कि तो
छोडकर रंगो को उजाले कि तरफ जाओ
उजाले में ही छुपे है रंग सारे
खोलोगे अगर मन कि आँखे तो
हो सकता है शायद तुम उन्हें देख पाओ  ई


लेखक: प्रवीन चन्द्र झांझी
   

Sunday, January 9, 2011

राजनीति

राजनीति

बनाया जब समाज इंसान ने
तो समाज को उसने राज्य का नाम दिया
चुना  अपने में सबसे भुदिमान और बलवान को 
और राजा का  उसको काम दिया

किया बुद्दी का उपयोग उसने
कर प्रजा की सेवा,शुल्क उनसे वसूल लिया
इस तरह राजा  और प्रजा का सम्बन्ध स्थापित हुआ
और राज्य कार्य का प्रचलन शुरू हुआ

मगर आज के युग में
राजा न सिर्फ कर वसूलना चाहता है
बल्कि धमकाता है प्रजा को और
और सेवा अपनी कराता है

भूल गया वो स्वराज को
उसकी तो बस एक ही नीति है
जिस भी नीति से मिले राज
वो नीति ही तो राजनिति है 

न देश, न समाज न प्रजा
की चिंता उसे सताती है
कैसे रहेगी सलामत  कुर्सी उसकी
ये चिंता उसको रात दिन खाती है

बचाने को कुर्सी उसने
कभी घटिया तोप को खरीद लिया
बजाये देने को श्रदांजली शहीदो को
ताबूतो में उनके घोटाला किया

कभी करवा कर दंगे
देश को इन्होने बाँट दिया
कभी जाति, कभी धर्म और कभी सीमा का
हौआ इन्होने खड़ा किया

है परेशान जनता
कोई रास्ता उसे नजर नही आता है
कभी रुलाता है प्याज उसे  और
और कभी टमाटर उसे सताता है

अरे सत्ता के भूखो
कभी कुछ तो शर्म करलिया करो
इसी मिटटी से पैदा हुए
इसीमे मिल जाओगे
कभी तो ये भी  सोच लिया करो
कभी तो ये भी सोच लिया करो ........II


लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

Tuesday, January 4, 2011

मतलब

मतलब


मतलब से पैदा हुआ,
करते हुए पूरे मतलब
यू ही तुझे मर जाना है
है मतलब का तेरा शरीर और
मतलब का ही ये जमाना है

जब करता है तूं मतलब अपना पूरा
तब तो तुझको मतलब मतलब नही लगता है
मगर जब करता है कोई और पूरा मतलब अपना
तब न जाने क्यों तुझको वो खलता है
जब होता है पूरा तेरा मतलब तब तो सब चलता है
मगर जब कोई कहता है ये ही तुझसे तो
न जाने तूं क्यों जलता है

है बनाना है अगर जग को साफ़ तो
मतलब का शब्द जीवन से अपने हटाना होगा
दुसरे करे तो मतलब और खुद करो तो बरकत
ये दोगलापन अपने जीवन से मिटाना होगा

जीना है अगर तो निस्वार्थ भाव से जियो
करना है अगर कर्म तो निष्काम भाव से करो
क्योंकि कामना ही स्वार्थ की जननी है
कामनाये भटकाती है मन  को की चाहे हो अच्छी या हो बुरी
पर इंसान को हर हाल में ये कामनाये ही तो पूरी करनी है

जब हरकोई अपने मतलब के पीछे भागने लग जायेगा
तब मानव और जानवर में कोई फर्क ही नही रह जाएगा
और तब शायद  मानव समाज का
मानो कोई मतलब ही नही रह जायेगा
है फर्क ये ही जानवर और इंसान में कि
जानवर सिर्फ अपने लिए और इंसान समाज के लिए जीता है
इंसान करता है नौछावर जान अपनी समाज के लिए और
जानवर अपने स्वार्थ के लिए दुसरे का खून तक पीता है

होगा करना फैसला अब क्योंकि है समय अब कम
बनना है वापिस इंसान से जानवर और 
बनकर जानवर अधोपतन की ओर जाना है
या फिर बनकर निस्वार्थ इंसान
धरती को स्वर्ग बनाना है, धरती को स्वर्ग बनाना है II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
    

Saturday, January 1, 2011

कहानी नई पुरानी

कहानी नई पुरानी

होते ही पैदा शुरू होती है मानव तेरी सवारी है
क्यों रोता है जाते देख किसी को
आज थी उसकी तो आनी कभी तेरी भी बारी है
है सदियों से सुनते आये सब
नही है नया कुछ भी इसमें
है दोहराती वोही पुरानी कहानी है
मेरे बुजर्गो ने थी सुनाई मुझको
है सुनाई मैंने तुमको
कल तुमने भी कहानी ये ही सुनानी है
पर सुनते सुनाते है सब पर नही करता कोई अम्ल
येही इस माया की निशानी है
होते है पैदा लेकर बोझा कर्मो का
दिखती है जंहा झलक एक ख़ुशी की
भाग पड़ते है भूलकर सब
नही समझते ये तब
कि जीवन नही नाम ख़ुशी का
ये तो है आला दुखो का
इन दुखो से ही तुझे ख़ुशी चुरानी है
भोग विलास में नही है ख़ुशी जीवन की
है भोग विलास तो गुलामी इन्द्रियों की
ये गुलामी ही तेरी अज्ञानता की निशानी है
जो चीज करती है खुश आज तुझको
वोही करेगी कल निराश तुझको
जो थी आज नई वो कल हो जानी पुरानी है
उठ खड़ा हो जा और दे तोड़ बंधन माया के
ले आश्रय उस परम पिता परमेश्वर का
अगर सची ख़ुशी तुझको पानी है
वरना सदियों से दोहराता आया
और सदियों तक रहेगा दोहराता
ये वो हो पुरानी कहानी है, ये वोही पुरानी कहानी है II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी