Friday, December 3, 2010

मेरा रास्ता

मेरा रास्ता

क्यों गिरता हूँ बार बार
आखिर कब तक गिरकर सम्भलता रहूँगा
इक दिन तो ऐसा गिरूंगा कि फिर उठ नही पाउँगा
और फिर कोई और गिरा नही पायेगा मुझे
मै हमेशा के लिए चला जाऊंगा
फिर लाख बुलाए मुझे
पर मै लौट कर नही आयूंगा
जब भी दो कदम चलता हूँ
कभी  खुद गिर जाता हूँ
या फिर कोई और मुझे गिरा देता है
या तो मेरे पूर्व जन्मो के कर्म है ऐसे
या फिर कोई स्वार्थी करने को पूरे अपने स्वार्थ
बनाकर अपनी अतृप्त वासनाओ को अडंगी
राह में मेरी अटका देता है
कभी किसी का अहंकार देखकर चलता मुझे
बिना बात के ही अपमानित महसूस कर जाता है
और जब खुद को नही चला पाता तो
देकर धक्का मुझे गिरा जाता है
देखते है ये गिरने सम्भलने का दौर
कब तक योंही चल पाता है
क्या कोई दुष्ट गिराकर बार बार
मुझे पथ भ्रष्ट कर पाता है
या फिर गिर गिर कर सम्भलकर
मुझे मेरा अभीष्ट रास्ता मिल जाता है II

प्रवीन चन्द्र झांझी