छुटकारा
हार हारकर इतना हारा कि अब हारो का हार गले में डाल लिया है
हैरान हो अपने मुकद्दर पर कि जिसने जब चाहा तब मुझको हरा दिया है
वैसे तो लोग आपस में खूब लड़े पर
आया जब सामने मै तो हराने को मुझे सब इकट्ठे हो गये
यंहा तक कि दिया था साथ कभी जिनका मैंने उन्हें बचाने के लिए
वक्त आने पर वो भी आकर सामने मेरे खड़े हो गये
कभी लोगो ने खुलकर मेरा साथ नही दिया
नही समझ पाया कि पीछे इसके राज़ है क्या
जिसको जब लगा मौका मेरे साथ अपने सम्बन्धो को उसने कैश किया
नही सोचा कभी किसी ने कि हर हार के बाद मुझ पर बीतती है क्या
हार हारकर हर बार नाम अपना मैंने 'हारा' डाल लिया है
जीते जी कभी जीत न सकूगा मैंने यह कडवा सच जान लिया है
पर इस जीवन से मै जिस दिन हार जाऊगा मत डालना हार मुझ पर
क्योंकि हारकर मै अपना जीवन इस हार से
पाकर छुटकारा अंतिम बाज़ी जीत जाऊगा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 'हारा'
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